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ई॒शा॒न इ॒मा भुव॑नानि॒ वीय॑से युजा॒न इ॑न्दो ह॒रित॑: सुप॒र्ण्य॑: । तास्ते॑ क्षरन्तु॒ मधु॑मद्घृ॒तं पय॒स्तव॑ व्र॒ते सो॑म तिष्ठन्तु कृ॒ष्टय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

īśāna imā bhuvanāni vīyase yujāna indo haritaḥ suparṇyaḥ | tās te kṣarantu madhumad ghṛtam payas tava vrate soma tiṣṭhantu kṛṣṭayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ई॒शा॒नः । इ॒मा । भुव॑नानि । वि । ई॒य॒से॒ । यु॒जा॒नः । इ॒न्दो॒ इति॑ । ह॒रितः॑ । सु॒ऽप॒र्ण्यः॑ । ताः । ते॒ । क्ष॒र॒न्तु॒ । मधु॑ऽमत् । घृ॒तम् । पयः॑ । तव॑ । व्र॒ते । सो॒म॒ । ति॒ष्ठ॒न्तु॒ । कृ॒ष्टयः॑ ॥ ९.८६.३७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:37 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:37


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (ईशानः) आप ईश्वर हैं। (इमा भुवनानि) इन सब भुवनों को (वीयसे) चलाते हैं। (हरितः) हरणशील शक्तियें (सुपर्ण्यः) जो चेतन हैं, उनको (युजानः) नियुक्त करते हैं। (ताः) वे (ते) तुम्हारी शक्तियें (मधुमद्घृतं) मीठा प्रेम हमारे लिये (क्षरन्तु) बहायें (पयः) और दुग्धादि स्निग्ध पदार्थों का प्रदान करें। (सोम) हे परमात्मन् ! (तव व्रते) तुम्हारे नियम में (कृष्टयः) सब मनुष्य (तिष्ठन्तु) स्थिर रहें ॥३७॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में परमात्मा के नियम में स्थिर रहने का वर्णन है, जैसा कि “अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि” इत्यादि मन्त्रों में व्रत की प्रार्थना है। यहाँ भी परमात्मा के नियमरूप व्रत के परिपालन की प्रार्थना है ॥३७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मधुमद् घृतं पयः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! (ईशानः) = सम्पूर्ण 'तेज निर्मल्य व दीप्ति' रूप ऐश्वर्यौवाला होता हुआ तू (इमा भुवनानि) = इन प्राणियों को (वीयसे) = प्राप्त होता है। शरीर को तू तेजस्विता देता है । मन को नैर्मल्य प्राप्त कराता हुआ तू बुद्धि को तीव्र करता है । हे इन्दो ! तू ही इस शरीररथ में (सुपर्ण्य) = उत्तमता से जिनका पालन व पूरण हुआ है उन (हरितः) = इन्द्रियों को (युजान:) = युक्त करता है। अर्थात् सोम ही इन्द्रियों को सशक्त व निर्दोष बनाता है। (ताः) = वे इन्द्रियाश्व[सुपर्ण्यः] (ते) = तेरे द्वारा (मधुमत्) = अत्यन्त माधुर्यवाली (घृतम्) = ज्ञानदीप्ति को तथा (पयः) = शक्ति के आप्यायन को (क्षरन्तु) = अपने में संचरित करें। सोमरक्षण द्वारा ज्ञानेन्द्रियाँ ज्ञान सम्पन्न हो और कर्मेन्द्रियाँ सशक्त बनें। हे सोम वीर्यशक्ते ! यह सब विचार कर (कृष्टयः) = श्रमशील मनुष्य (तव) = तेरे (व्रते) = व्रत में (तिष्ठन्तु) = स्थित हों । सोमरक्षण के लिये जो आवश्यक कर्म हैं, उन्हें ये करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम सब ऐश्वर्यों को प्राप्त कराता है। ज्ञानेन्द्रियों को यह ज्ञान सम्पन्न बनाता है और कर्मेन्द्रियों को यह सशक्त करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूपपरमात्मन् ! (ईशानः) त्वमीश्वरोऽसि। (इमा, भुवनानि) इमान्यखिलानि भुवनानि (वीयसे) चालयसि। (हरितः) हरणशीलशक्तयः (सुपर्ण्यः) याश्चेतनास्सन्ति (युजानः) ताः योजयसि। (ताः) पूर्वोक्ताः (ते) तव शक्तयः (मधुमत्, घृतं) मधुरप्रेम मह्यं (क्षरन्तु) परिवाहयन्तु। अपि च (पयः) दुग्धादिस्निग्धपदार्थान् ददतु। (सोम) हे परमात्मन् ! (तव, व्रते) तव नियमे (कृष्टयः) सर्वे मानवाः (तिष्ठन्तु) स्थिता भवन्तु ॥३७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, Indu, lord of light and beauty of peaceful life, you rule over all these regions of the world harnessing dynamic forces of nature’s energy. May these forces of yours produce and shower on us ghrta and milk of honeyed sweetness and may the people abide by your laws and discipline of life.