'तवं जज्ञानं जेन्यं विपश्चितम् '
पदार्थान्वयभाषाः - (सप्त) = सात 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' = दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख रूप सप्तर्षि (स्व-सारः) = आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाले होते हुए, (मातरः) = ज्ञान का निर्माण करनेवाले होते हैं और (शिशुं) = बुद्धि को तीव्र करनेवाले (सोमम्) = सोम को (अभि) [गच्छन्ति] = प्राप्त होते हैं । वस्तुतः ज्ञानेन्द्रियों को प्रभु की उपासना व ज्ञान प्राप्ति में लगाना ही सोमरक्षण का प्रमुख साधन है । उस सोम को ये सप्तर्षि प्राप्त होते हैं, जो कि (नवम्) = स्तुत्य है, (जज्ञानम्) = शक्तियों के प्रादुर्भाव को करनेवाला है (जेन्यम्) = विजयशील है, (विपश्चितम्) = ज्ञानी है, हमारे ज्ञान को बढ़ानेवाला है । जो सोम (अपां गन्धर्वम्) = कर्मों की प्रतिपादक ज्ञानवाणियों को धारण करनेवाला है [अपस् = कर्म], (दिव्यम्) = हमें दिव्यवृत्ति का बनानेवाला है, (नृचक्षसम्) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाला है। इस सोम को (विश्वस्य भुवनस्य) = सम्पूर्ण भुवन की (राजसे) = दीप्ति के लिये प्राप्त करते हैं। शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम सारे शरीर को दीप्त करनेवाला होता है। शरीर को तेजस्विता से, मन को निर्मलता से तथा बुद्धि को तीव्रता से यह सोम उत्कृष्ट बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जब शरीरस्थ इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में लगेंगी और प्रभु उपासन में प्रवृत्त होंगी तभी सोम का रक्षण होगा। रक्षित सोम सम्पूर्ण शरीर को दीप्त बनायेगा ।