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स॒प्त स्वसा॑रो अ॒भि मा॒तर॒: शिशुं॒ नवं॑ जज्ञा॒नं जेन्यं॑ विप॒श्चित॑म् । अ॒पां ग॑न्ध॒र्वं दि॒व्यं नृ॒चक्ष॑सं॒ सोमं॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य रा॒जसे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sapta svasāro abhi mātaraḥ śiśuṁ navaṁ jajñānaṁ jenyaṁ vipaścitam | apāṁ gandharvaṁ divyaṁ nṛcakṣasaṁ somaṁ viśvasya bhuvanasya rājase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒प्त । स्वसा॑रः । अ॒भि । मा॒तरः॑ । शिशु॑म् । नव॑म् । ज॒ज्ञा॒नम् । जेन्य॑म् । वि॒पः॒ऽचित॑म् । अ॒पाम् । ग॒न्ध॒र्वम् । दि॒व्यम् । नृ॒ऽचक्ष॑सम् । सोम॑म् । विश्व॑स्य । भुव॑नस्य । रा॒जसे॑ ॥ ९.८६.३६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:36 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:36


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सप्त स्वसारः) ज्ञानेन्द्रियों के सप्त छिद्रों से गति करनेवाली इन्द्रियों की ७ वृत्तियें (अभिमातरः) जो ज्ञानयोग्य पदार्थ को प्रमाणित करती हैं, वे (शिशुं) सर्वोपास्य परमात्मा को (नवं) जो नित्य नूतन है (जज्ञानं) और स्फुट है (जेन्यं) सबका जेता (विपश्चितं) और सबसे बड़ा विज्ञानी है, उसको विषय करती हैं। जो परमात्मा (अपां) जलों का (गन्धर्वं) और पृथिवी का धारण करनेवाला है, (दिव्यं) दिव्य है, (नृचक्षसं) सर्वान्तर्य्यामी है, (सोमं) सर्वोत्पादक है, उसकी (विश्वस्य भुवनस्य राजसे) सम्पूर्ण भुवनों के ज्ञान के लिये विद्वान् लोग उपासना करते हैं ॥३६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा का ध्यान इसलिये किया जाता है कि परमात्मा अपहतपाप्मादि गुणों को देकर उपासक को भी दिव्य दृष्टि दे, ताकि उपासक लोक-लोकान्तरों के ज्ञान को उपलब्ध कर सकें। इसी अभिप्राय से योग में लिखा है कि ‘भुवनज्ञानं सूर्य्ये संयमात्’ परमात्मा में चित्तवृत्ति का निरोध करने से लोक-लोकान्तरों का ज्ञान होता है ॥३६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'तवं जज्ञानं जेन्यं विपश्चितम् '

पदार्थान्वयभाषाः - (सप्त) = सात 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' = दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व मुख रूप सप्तर्षि (स्व-सारः) = आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाले होते हुए, (मातरः) = ज्ञान का निर्माण करनेवाले होते हैं और (शिशुं) = बुद्धि को तीव्र करनेवाले (सोमम्) = सोम को (अभि) [गच्छन्ति] = प्राप्त होते हैं । वस्तुतः ज्ञानेन्द्रियों को प्रभु की उपासना व ज्ञान प्राप्ति में लगाना ही सोमरक्षण का प्रमुख साधन है । उस सोम को ये सप्तर्षि प्राप्त होते हैं, जो कि (नवम्) = स्तुत्य है, (जज्ञानम्) = शक्तियों के प्रादुर्भाव को करनेवाला है (जेन्यम्) = विजयशील है, (विपश्चितम्) = ज्ञानी है, हमारे ज्ञान को बढ़ानेवाला है । जो सोम (अपां गन्धर्वम्) = कर्मों की प्रतिपादक ज्ञानवाणियों को धारण करनेवाला है [अपस् = कर्म], (दिव्यम्) = हमें दिव्यवृत्ति का बनानेवाला है, (नृचक्षसम्) = सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाला है। इस सोम को (विश्वस्य भुवनस्य) = सम्पूर्ण भुवन की (राजसे) = दीप्ति के लिये प्राप्त करते हैं। शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम सारे शरीर को दीप्त करनेवाला होता है। शरीर को तेजस्विता से, मन को निर्मलता से तथा बुद्धि को तीव्रता से यह सोम उत्कृष्ट बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जब शरीरस्थ इन्द्रियाँ ज्ञान प्राप्ति में लगेंगी और प्रभु उपासन में प्रवृत्त होंगी तभी सोम का रक्षण होगा। रक्षित सोम सम्पूर्ण शरीर को दीप्त बनायेगा ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सप्त, स्वसारः) ज्ञानेन्द्रियाणां सप्तच्छिद्रैः गामिन्य इन्द्रियाणां सप्तवृत्तयः (अभि, मातरः) याः ज्ञानयोग्यपदार्थं प्रमाणितं कुर्वन्ति ताः (शिशुं) सर्वोपास्यपरमात्मानं (नवं) नित्यनूतनं पुनः किम्भूतं (जज्ञानं) स्फुटं किञ्च (जेन्यं) सर्वजेतारं पुनः (विपश्चितं) सर्वोपरि विज्ञानिनमेवम्भूतं तं विषयं कुर्वन्ति। अपि च परमात्मा (अपां) जलानाम् अपि च (गन्धर्वं) पृथिव्या धारणकर्ता अस्ति। (दिव्यं) प्रकाशमानः अपि च (नृचक्षसं) सर्वान्तर्याम्यस्ति। (सोमं) सर्वोत्पादकश्चास्ति। तं (विश्वस्य, भुवनस्य, राजसे) अखिलभुवनानां ज्ञानाय विद्वांस उपसेवन्ते ॥३६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Seven sisterly perceptive, conceptive and discriminative organs of sense and mind jointly confirm the presence of Soma, all pervasive, ever new, informing, victorious, universally wise, sustainer of waters and earth, heavenly, and constant watchful guardian of humanity. They perceive you, Soma, as you pervade and illuminate all regions of the world.