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स सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒: परि॑ व्यत॒ तन्तुं॑ तन्वा॒नस्त्रि॒वृतं॒ यथा॑ वि॒दे । नय॑न्नृ॒तस्य॑ प्र॒शिषो॒ नवी॑यसी॒: पति॒र्जनी॑ना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa sūryasya raśmibhiḥ pari vyata tantuṁ tanvānas trivṛtaṁ yathā vide | nayann ṛtasya praśiṣo navīyasīḥ patir janīnām upa yāti niṣkṛtam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । सूर्य॑स्य । र॒श्मिऽभिः॑ । परि॑ । व्य॒त॒ । तन्तु॑म् । त॒न्वा॒नः । त्रि॒ऽवृत॑म् । यथा॑ । वि॒दे । नय॑न् । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒ऽशिषः॑ । नवी॑यसीः । पतिः॑ । जनी॑नाम् । उप॑ । या॒ति॒ । निः॒ऽकृ॒तम् ॥ ९.८६.३२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:32 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:32


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - वह परमात्मा (यथाविदे) यथार्थ ज्ञानी के लिये (त्रिवृतं) तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य्य को (तन्वानः) विस्तार करता हुआ (तन्तुं परिव्यत) सन्ततिरूप तन्तु का विस्तार करता है (सः) और वह परमात्मा (सूर्य्यस्य रश्मिभिः) सूर्य्य की किरणों द्वारा प्रकाश करता हुआ (ऋतस्य प्रशिषः) सच्चाई की प्रशंसा (नवीयसीः) जो कि नित्य नूतन है, उसको (नयन्) प्राप्त कराता हुआ (जनीनां) मनुष्यों के (निष्कृतं) संस्कृत अन्तःकरण को (उपयाति) प्राप्त होता है। (पतिः) वही परमात्मा इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पति है ॥३२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा इस संसार में प्रथम, मध्यम, उत्तम तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य्य की मर्यादा को निर्माण करता है। उन कृतब्रह्मचर्य्य पुरुषों से शुभ सन्तति का प्रवाह संसार में प्रचलित होता है ॥३२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'तन्तुं तन्वानस्त्रिवृतं यथाविदे'

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) = वह सोम (सूर्यस्य रश्मिभिः) = ज्ञान सूर्य की किरणों से (परिव्यत) = अपने को आच्छादित करता है सोमरक्षण से ज्ञान दीप्त होता है। यह सोम (यथा विदे) = यथार्थ ज्ञानवाले पुरुष के लिये (त्रिवृतं तन्तुं) = तीनों सवनों में चलनेवाले 'प्रातः, मध्यान्तर व सायं' के सवनों में व्याप्त होनेवाले जीवनतन्तु को (तन्वानः) = विस्तृत करता है । अर्थात् यह सोम दीर्घायुष्य का कारण बनता है । यह सोम हमारे जीवनों में (ऋतस्य) = उस पूर्ण सत्य प्रभु की (नवीयसी:) = अत्यन्त स्तुत्य (प्रशिषः) = आज्ञाओं को नयत् प्राप्त कराता है। इस सोम के रक्षण के द्वारा हम प्रभु की आज्ञाओं के पालन में चल पाते हैं। यह सोम (जनीनां) = इन वेदवाणीरूप प्रभु पत्त्रियों का (पतिः) = रक्षक है, अथवा शक्तियों के प्रादुर्भाव का रक्षक है। यह सोम अन्ततः (निष्कृतम्) = उस पूर्ण संस्कृत ब्रह्मलोक को (उपयाति) = समीपता से प्राप्त होता है। हमारी मोक्ष प्राप्ति का साधन बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम ज्ञानवस्त्र को धारण कराता है, जीवन को दीर्घ करता है,प्रभु की आज्ञाओं को हमें पालन कराता है, शक्तिविकास करता हुआ मोक्ष का साधन बनता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - स परमात्मा (यथा, विदे) सत्यज्ञानिने (त्रिवृतं) त्रिधा ब्रह्मचर्य्यं (तन्वानः) विस्तारयन् (तन्तुं, परि, व्यत) सन्ततिरूपतन्तुं विस्तारयति (सः) अपि च स परमात्मा (सूर्य्यस्य, रश्मिभिः) सूर्य्यकिरणैः प्रकाशयन् (ऋतस्य, प्रशिषः) सत्यस्य प्रशंसा (नवीयसीः) या नित्यनूतनास्ति तां (नयन्) प्राप्नुवन् (जनीनां) मानवानां (निष्कृतं) संस्कृतमन्तःकरणं (उप, याति) प्राप्नोति। (पतिः) स एव परमात्मा अस्य निखिलब्रह्माण्डस्येश्वरोऽस्ति ॥३२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Soma, creative Spirit of the universe, wrapped in the light of his own refulgence, radiating by the rays of the sun, weaving and expanding the three dimensional web of existence as he intends and plans, inducting the newest and latest designs of the laws of cosmic evolution as father generator of successive generations, radiates and moves to the creative vedi of cosmic yajna.