पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अत्यः न) = सततगामी अश्व के समान (हियानः) = प्रेरित किया जाता हुआ तू (वाजं अभि अर्ष) = संग्राम की ओर चलनेवाला है। घोड़ा बाह्य संग्रामों में विजय का साधन बनता है, इसी प्रकार यह सोम शरीर के अन्दर रोगवृत्तियों के साथ संग्राम में हमें विजयी बनाता है । (स्वर्वित्) = प्रकाश को प्राप्त करानेवाला तू (अद्रिमातरम्) = उपासक के निर्माण करनेवाले, हमें उपासनामय जीवनवाला बनानेवाले (दिवः कोशम्) = विज्ञानमय कोश की ओर तू [ आधर्ष ] गतिवाला हो। हमें यह सोम प्रभु का 'ज्ञानी उपासक' बनाता है। [२] (वृषा) = शक्ति का सेचन करनेवाला तू (पवित्रे) = पवित्र रूप में तथा (अव्यये) = अविनाशी अधि सानो समुचित प्रदेश में, विज्ञानमय कोश में अथवा मस्तिष्क रूप द्युलोक में (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ यह सोम (इन्द्रियाय) = बल के लिये होता है तथा (धायसे) = हमारे धारण के लिये होता है। यह सोम पवित्र हृदय में तथा विज्ञानमय कोश में पवित्र होता है, अर्थात् हृदय में वासनाओं को न आने देने पर तथा स्वाध्याय में लगे रहने पर यह सोम पवित्र बना रहता है। शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ यह शरीर का धारण करता है और उसे बल सम्पन्न करता है एवं इन्द्रिय को यह सबल बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम शरीर में रोमकृमियों के साथ संग्राम में हमें विजयी बनाता है । उपासना व स्वाध्याय से पवित्र बनाया गया सोम हमारा धारण करता है और हमें सबल बनाता है।