पदार्थान्वयभाषाः - (असश्चतः) = [Not defeated or overcome] अपराजित हुई-हुई वासनाओं से अनाक्रान्त (शतधारा:) = शतवर्ष पर्यन्त अपना धारण करनेवाली, (अभिश्रियः) = प्रातः - सायं प्रभु का उपासना करनेवाली [श्रि सेवायाम्] (उदन्युवः) = रेतः कण रूप उदक की कामनावाली (ताः) = वे प्रजायें (हरि:) = इस दुःखहर्ता सोम को अवनवन्ते अन्दर ही अन्दर प्राप्त करती हैं। ये प्रजाएँ सोम को शरीर के अन्दर स्थापित करती हैं । (क्षिपः) = वासनाओं को अपने से परे फेंकनेवाले लोग, (दिवः) = प्रकाश के (अधिरोचने) = खूब दीप्त होनेवाले तृतीये पृष्ठे-तीर्णतम अथवा 'शरीर व हृदय' से ऊपर तीसरे मस्तिष्क के स्थान में [ आधार में] (गोभिः आवृतम्) = ज्ञानरश्मियों से आवृत हुए हुए इस सोम को (परिमृजन्ति) = शुद्ध करते हैं । वस्तुतः सोम परिशुद्धि के लिये आवश्यक है कि हम अपने खाली समय का उपयोग स्वाध्याय में करे। यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और इस प्रकार सोम का सदुपयोग हो जाता है। इस सोम के द्वारा हम जीवन में सदा तृतीय भूमिका में निवास करनेवाले बन पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वासनाओं से अनाकान्त होकर, सौ वर्ष तक चलने का संकल्प करके, प्रातः- सायं प्रभु का उपासन करते हुए, सोमरक्षण की प्रबल इच्छावाले बनकर, खाली समय को स्वाध्याय में बिताते हुए हम सोम का रक्षण कर पाते हैं ।