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त्वां सो॑म॒ पव॑मानं स्वा॒ध्योऽनु॒ विप्रा॑सो अमदन्नव॒स्यव॑: । त्वां सु॑प॒र्ण आभ॑रद्दि॒वस्परीन्दो॒ विश्वा॑भिर्म॒तिभि॒: परि॑ष्कृतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ soma pavamānaṁ svādhyo nu viprāso amadann avasyavaḥ | tvāṁ suparṇa ābharad divas parīndo viśvābhir matibhiḥ pariṣkṛtam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वाम् । सो॒म॒ । पव॑मानम् । सु॒ऽआ॒ध्यः॑ । अनु॑ । विप्रा॑सः । अ॒म॒द॒न् । अ॒व॒स्यवः॑ । त्वाम् । सु॒ऽप॒र्णः । आ । अ॒भ॒र॒त् । दि॒वः । परि॑ । इन्दो॒ इति॑ । विश्वा॑भिः । म॒तिऽभिः॑ । परि॑ऽकृतम् ॥ ९.८६.२४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:24 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:16» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:24


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (पवमानं त्वां) सर्वपूज्य तुझको (स्वाध्यः) सुकर्म्मी लोग (विप्रासः) जो मेधावी हैं और (अवस्यवः) आपकी उपासना की इच्छा करनेवाले हैं, वे (अन्वमदन्) आपकी स्तुति करते हैं। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! (त्वां) तुझको (सुपर्णः) बोधयुक्त उपासक (आभरत्) उपासना द्वारा ग्रहण करता है। तुम कैसे हो, (दिवस्परि) कि द्युलोक की भी मर्य्यादा को उल्लङ्घन करके वर्तमान हो और (विश्वाभिर्मतिभिः) सम्पूर्ण ज्ञानों से (परिष्कृतम्) अलंकृत हो ॥२४॥
भावार्थभाषाः - जो लोग विद्या द्वारा अपनी बुद्धि का परिष्कार करते हैं, वे ही परमात्मा की विभूति को जान सकते हैं, अन्य नहीं ॥२४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वाध्यः विप्रासः अवस्यवः

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सोम) = वीर्यशक्ते! (त्वां) = तुझे (पवमानम्) = पवित्र करनेवाले (अनु) = तेरे पीछे, अर्थात् तेरे अनुसार, जितना-जितना तेरा रक्षण करते हैं उतना उतना (अमदन्) = आनन्दित होते हैं। कौन ? (स्वाध्यः) = [सुष्ठुध्याताः] प्रभु का उत्तम उपासन करनेवाले, (विप्रासः) = ज्ञानी व अपना पूरण करनेवाले, तथा (अवस्यवः) = रक्षण की कामनावाले । हे (इन्दो त्वाम्) = सोम तुझे (सुपर्ण:) = अपना अच्छी प्रकार पालन व पूरण करनेवाला (दिवस्परि) = मस्तिष्करूप द्युलोक का लक्ष्य करके अर्थात् मस्तिष्क को परिष्कृत करने के हेतु से (आभरत्) = शरीर में चारों ओर धारण करता है। शरीर में सोम के सुरक्षित होने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ बना रहता है । उस तुझे यह सुपर्ण धारण करता है या अपने में प्राप्त कराता है, जो तू (विश्वाभिः मतिभिः) = सब बुद्धियों से (परिष्कृतम्) = सुशोभित व अलङ्कृत है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें प्रभुप्रवण करता है, हमारी कमियों को दूर करता है तथा हमारा रक्षण करता है । यह सब बुद्धियों से अलंकृत हुआ हुआ हमारे ज्ञान को बढ़ाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे परमात्मन् ! (पवमानं, त्वां) सर्वपूज्यं त्वां (स्वाध्यः) सुकर्म्माणः किम्भूताः (विप्रासः) मेधाविनः पुनः किम्भूताः (अवस्यवः) त्वदुपासनपरायणाः (अनु, अमदन्) भवन्तं स्तुवन्ति। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप ! (त्वां) भवन्तं (सुपर्णः) सबोधोपासकः (आ, अभरत्) उपासनया गृह्णाति किम्भूतस्त्वं (दिवः, परि) द्युलोकस्य मर्य्यादामुल्लङ्घ्य स्थितः। अपरञ्च (विश्वाभिः, मतिभिः) निखिलज्ञानैः (परिष्कृतं) अलङ्कृतोऽसि ॥२४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, pure and purifying dynamic spirit of the world of existence, men of noble thought, will and action, veteran saints, seekers of divine favour and protection adore and exalt you. Indu, O spirit of life and light higher than highest regions of light, exalted and glorified in purity by all sages of the world of wisdom, the imaginative seeker of divinity attains to you by his flights of meditation.