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अ॒यं पु॑ना॒न उ॒षसो॒ वि रो॑चयद॒यं सिन्धु॑भ्यो अभवदु लोक॒कृत् । अ॒यं त्रिः स॒प्त दु॑दुहा॒न आ॒शिरं॒ सोमो॑ हृ॒दे प॑वते॒ चारु॑ मत्स॒रः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayam punāna uṣaso vi rocayad ayaṁ sindhubhyo abhavad u lokakṛt | ayaṁ triḥ sapta duduhāna āśiraṁ somo hṛde pavate cāru matsaraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒यम् । पु॒ना॒नः । उ॒षसः॑ । वि । रो॒च॒य॒त् । अ॒यम् । सिन्धु॑ऽभ्यः । अ॒भ॒व॒त् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒क॒ऽकृत् । अ॒यम् । त्रिः । स॒प्त । दु॒दु॒हा॒नः । आ॒ऽशिर॑म् । सोमः॑ । हृ॒दे । प॒व॒ते॒ । चारु॑ । म॒त्स॒रः ॥ ९.८६.२१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:21 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:16» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:21


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अयं) पूर्वोक्त परमात्मा अपनी शक्तियों से (पुनानः) पवित्र करता हुआ और (उषसः) उषाकाल का (विरोचयत्) प्रकाश करता हुआ (सिन्धुभ्यः) स्यन्दनशीला प्रकृति के सूक्ष्म तत्त्वों से (लोककृत्) संसार का करनेवाला (अभवत्) हुआ (उ) यह दृढ़ताबोधक है। (अयं त्रिः, सप्त) यह परमात्मा प्रकृति के एकविंशति महत्तत्त्वादि तत्त्वों को (दुहुहानः) दोहन करता हुआ (आशिरं) ऐश्वर्य को उत्पन्न करके (सोमः) यह जगदुत्पादक परमात्मा (चारु मत्सरः) जो अत्यन्त आह्लादक है, वह (हृदे) हमारे हृदय में (पवते) पवित्रता प्रदान करता है ॥२१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने प्रकृति से महत्तत्त्व उत्पन्न किया और महत्तत्त्व से जो अहंकारादि एकविंशति गण है, उसी का यहाँ “त्रिः सप्त” शब्द से गणन है, किसी अन्य का नहीं ॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सिन्धुभ्यः लोककृत्' अभवत्

पदार्थान्वयभाषाः - (अयम्) = यह सोम (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ (उषसः) = दोषदहन के द्वारा (विरोचयत्) = हमारे जीवनों को दीप्त करता है । (अयं) = यह सोम (सिन्धुभ्यः) = ज्ञान नदियों के प्रवाह के द्वारा निश्चय से (लोककृत्) = आलोक व प्रकाश को करनेवाला होता है। यह सोम हृदय को निर्दोष व मस्तिष्क को ज्ञान दीप्त बनाता है । (अयम्) = यह (त्रिसप्त) = इक्कीस बार (आशिरम्) = समन्तात् दोष विनाश का (दुदुहान:) = प्रपूरण करता हुआ, सब इक्कीस शक्तियों को निर्दोष बनाता हुआ, (सोमः) = सोम (हृदे पवते) = हृदय के लिये गतिवाला होता है, अर्थात् शरीर में ही सुरक्षित होकर ऊर्ध्वगतिवाला होता है । यह (चारु) = बड़ी सुन्दरता से जीवन में (मत्सरः) = आनन्द का संचार करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम पवित्रता व प्रकाश को प्राप्त कराता है। शरीर की सब शक्तियों को निर्दोष बनाता हुआ, शरीर में ऊर्ध्वगतिवाला होकर, हमें आनन्द से परिपूर्ण करता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अयं) पूर्वोक्तः परमात्मा स्वशक्तिभिः (पुनानः) पवित्रयन् अपि च (उषसः) प्रभातकालं (विरोचयत्) प्रकाशयन् (सिन्धुभ्यः) स्यन्दनशीलप्रकृतेः सूक्ष्मतत्त्वैः (लोककृत्) जगत्कर्ता (अभवत्) भवति स्म। (उ) अयं दृढताबोधकोऽस्ति (अयं, त्रिः, सप्त) अयं परमात्मा प्रकृतेरेकविंशतिसङ्ख्याक-महत्तत्वादिपदार्थान् (दुदुहानः) दुहन् (आशिरं) ऐश्वर्यमुत्पाद्य (सोमः) अयं जगदुत्पादकपरमात्मा किम्भूतः, (चारु, मत्सरः) अतिशयाह्लादकः (हृदे) मम हृदये (पवत) पवित्रयति ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This Soma, illuminating the dawns, became the maker of the worlds from the oceanic flood of particles of Prakrti, the one material cause of the universe. Creating the milk of nourishment and sustenance of life from thrice seven orders of Prakrti, Mother Nature, its own shakti, that is, three modes of sattva, rajas and tamas (mind, motion and matter), two generalities of Mahat and Ahankara (tangible nature from the intangible, and identity from the tangible) and five specificities of basic elements (Akasha, Vayu, Agni, Apah and Prthivi), it flows pure, purifying, beatific and ecstatic in the heart core of the soul.