पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दिविस्पृशम्) = मस्तिष्क रूप द्युलोक में स्पर्श करनेवाले (द्रापिम्) = कवच को (वसानः) = आच्छादित करता हुआ (यजतः) = अत्यन्त आदरणीय व संगतिकरण योग्य यह सोम (अन्तरिक्षप्राः) = हृदयान्तरिक्ष का पूरण करनेवाला होता है और (भुवनेषु) = शरीर के सब भुवनों में, अंग-प्रत्यंग में यह (अर्पितः) = अर्पित होता है। शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम कवच का काम करता है, मस्तिष्क को भी सुरक्षित करता है और शरीर को भी रोगों से आक्रान्त नहीं होने देता । साथ ही यह हृदय को भी वासनाओं के आक्रमण से बचाता है । [२] (स्वः) = प्रकाश को (जज्ञान:) = प्रादुर्भाव करता हुआ यह (नभसा) = मस्तिष्क रूप द्युलोक से (अभ्यक्रमीत्) = गतिवाला होता है । सोम का मस्तिष्क रूप द्युलोक की ओर गतिवाला होना ही 'ऊर्ध्वरता' बनता है, इस समय यह सोम (अस्य) = इस जीव के (प्रत्नम् पितरम्) = उस सनातन पिता प्रभु का (आविवासति) = पूजन करता है । इस प्रकार यह सोम हमें ब्रह्मलोक में पहुँचानेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम शरीर के लिये कवच के समान है। इस कवच के कारण शरीर में रोग नहीं आ पाते, मस्तिष्क में कुविचार नहीं आते, हृदय वासनाओं से हीन अवस्था में नहीं पहुँचाया जाता। मनुष्य प्रभु प्रवण होता है।