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अग्रे॒ सिन्धू॑नां॒ पव॑मानो अर्ष॒त्यग्रे॑ वा॒चो अ॑ग्रि॒यो गोषु॑ गच्छति । अग्रे॒ वाज॑स्य भजते महाध॒नं स्वा॑यु॒धः सो॒तृभि॑: पूयते॒ वृषा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agre sindhūnām pavamāno arṣaty agre vāco agriyo goṣu gacchati | agre vājasya bhajate mahādhanaṁ svāyudhaḥ sotṛbhiḥ pūyate vṛṣā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्रे॑ । सिन्धू॑नाम् । पव॑मानः । अ॒र्ष॒ति॒ । अग्रे॑ । वा॒चः । अ॒ग्रि॒यः । गोषु॑ । ग॒च्छ॒ति॒ । अग्रे॑ । वाज॑स्य । भ॒ज॒ते॒ । म॒हा॒ऽध॒नम् । सु॒ऽआ॒यु॒धः । सो॒तृऽभिः॑ । पू॒य॒ते॒ । वृषा॑ ॥ ९.८६.१२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:86» मन्त्र:12 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:5» मन्त्र:12


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जो परमात्मा (वाचोऽग्रियः) वेदरूपी वाणियों का मुख्य कारण है और (गोषु) अपनी सत्ता से लोक-लोकान्तरों में (गच्छति) प्राप्त है, (सिन्धूनां) प्रकृति की वाष्परूप अवस्था से (अग्रे) पहले (पवमानः) पवित्र करता हुआ (अर्षति) सर्वत्र प्राप्त है। ऐसे परमात्मा को उपासक (वाजस्याग्रे) धनादि ऐश्वर्यों से पहले (महाधनं) महाधनरूप उक्त परमात्मा को (भजते) सेवन करता है। ऐसे उपासक को (स्वायुधः) अनन्त प्रकार की शक्तिवाला (सोतृभिः) अपनी संस्कृत करनेवाली शक्तियों के द्वारा (वृषा) बलस्वरूप परमात्मा (पूयते) पवित्र करता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन पञ्चतन्मात्राओं के आदिकारण अहंकार और महत्तत्त्व तथा प्रकृति से भी पहले विराजमान था। उसी ने इस शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि गुणयुक्त संसार का निर्माण किया है। जिन विचित्र शक्तियों से परमात्मा इन सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्त्वों का निर्माता है, उनसे हमारे हृदय को शुद्ध करे ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अग्रे अर्षति

पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानः) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाला यह सोम (सिन्धूनाम्) = [स्यन्द्] निरन्तर क्रियाशील पुरुषों के जीवन में (अग्रे अर्षति) = आगे गतिवाला होता है। शरीर में आगे गतिवाला होता हुआ यह अन्तः मस्तिष्क रूप द्युलोक में ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है। (वाचः) = [वच् व्यक्तायां वाचि] प्रभु के नामों का [गुणों का] उच्चारण करनेवाले के जीवन में यह सोम (अग्रे) = आगे बढ़ता है। (अग्रियः) = यह शरीर में आगे बढ़नेवाला सोम (गोषु गच्छति) = ज्ञान की वाणियों में गतिवाला होता है, अर्थात् हमारे ज्ञान को बढ़ानेवाला होता है। (अग्रे) = आगे बढ़ता हुआ यह सोम (वाजस्य) = शक्ति के (महाधनम्) = उत्कृष्ट धन को (भजते) = प्राप्त करता है, हमें यह सोम उत्कृष्ट शक्तिवाला बनाता है । (स्वायुधः) = [सु+आयुध] यह सोम 'इन्द्रिय-मन व बुद्धि' रूप सब आयुधों को, जीवन संग्राम के शस्त्रों को उत्तम बनाता है। इसीलिये (सोतृभिः) = सोम का उत्पादन करनेवाले इन पुरुषों से यह (पूयते) = पवित्र किया जाता है। (वृषा) = यह सब अंगों में सुरक्षित हुआ हुआ सोम सब अंगों को शक्तिशाली बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - यः परमात्मा (वाचः, अग्रियः) वेदवाणीनां प्रधानकारणमस्ति। अन्यच्च (गोषु) स्वसत्तया लोकलोकान्तरेषु (गच्छति) प्राप्नोति। (सिन्धूनां) प्रकृतेः वाष्परूपावस्थया (अग्रे) प्रथमं (पवमानः) पवित्रयन् (अर्षति) सर्वत्र प्राप्नोति। एवम्भूतस्य परमात्मन उपासकः (वाजस्य, अग्रे) धनाद्यैश्वर्य्यैः प्रथमं (महाधनं) महाधनं परमात्मानं (भजते) सेवते। एवम्भूतमुपासकम् (स्वायुधः) अनन्तशक्तिसम्पन्नः (सोतृभिः) स्वसंस्कारशक्तिभिः (वृषा) बलस्वरूपः परमात्मा (पूयते)   पवित्रयति ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, prime spirit of the world in existence, pure and purifying, moves as the first cause of flowing waters, first cause of the flow of thought and speech, and it moves as the prime cause of the motions of stars and planets. First, before the start of evolution, it takes on the great warlike dynamics of the creative evolutionary flow of existence. The same omnipotent generous power, mighty of arms, is adorned and exalted in yajna by celebrants on the vedi designed by the lord and structured by his Shakti, Prakrti.