पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (कनिक्रदत्) = प्रभु के नामों का उच्चारण करता हुआ तू (कलशे) = इस शरीर कलश में (गोभिः) = ज्ञान की वाणियों से (अज्यसे) = अलंकृत किया जाता है । सोमरक्षण से जहाँ प्रभु- प्रवणता उत्पन्न होती है, वहाँ ज्ञानाग्नि का दीपन होकर ज्ञानवृद्धि होती है । अब तू (अव्ययम्) = उस एक रस-विविधरूपों में न जानेवाले (निर्विकारं वारम्) = वरणीय प्रभु को (समया) = समीपता से (वि अर्षसि) = विशेषरूप से प्राप्त होता है । सोमरक्षण हमें प्रभु के समीप पहुँचाता है । [२] इस प्रभु उपासना से वासना विनाश के द्वारा (मर्मृज्यमानः) = शुद्ध किया जाता हुआ तू (अत्यः न) = निरन्तर गतिशील अश्व के समान (सानसिः) = संभजनीय होता है, युद्ध विजय के लिये जैसे वह अन्य उपदेश होता है, उसी प्रकार जीवन संग्राम में विजय के लिये यह सोम उपादेय है। हे सोम ! तू (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (जठरे) = शरीर मध्य में (सम् अक्षरः) = सम्यक् क्षरित होनेवाला है। शरीर में सर्वत्र गतिवाला होता हुआ वहाँ-वहाँ की कमियों को तू दूर करनेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हम प्रभुस्तवन की वृत्तिवाले होते हैं, ज्ञान को प्राप्त करते हैं, जीवन संग्राम में विजयी बनते हैं।