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अ॒भि त्यं गाव॒: पय॑सा पयो॒वृधं॒ सोमं॑ श्रीणन्ति म॒तिभि॑: स्व॒र्विद॑म् । ध॒नं॒ज॒यः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॒ विप्र॑: क॒विः काव्ये॑ना॒ स्व॑र्चनाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhi tyaṁ gāvaḥ payasā payovṛdhaṁ somaṁ śrīṇanti matibhiḥ svarvidam | dhanaṁjayaḥ pavate kṛtvyo raso vipraḥ kaviḥ kāvyenā svarcanāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । त्यम् । गावः॑ । पय॑सा । प॒यः॒ऽवृध॑म् । सोम॑म् । श्री॒ण॒न्ति॒ । म॒तिऽभिः॑ । स्वः॒ऽविद॑म् । ध॒न॒म्ऽज॒यः । प॒व॒ते॒ । कृत्व्यः॑ । रसः॑ । विप्रः॑ । क॒विः । काव्ये॑न । स्वः॑ऽचनाः ॥ ९.८४.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:84» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (पयोवृधं) ज्ञान से वृद्धि को प्राप्त जो आप हैं, (त्यं) उस आपको (गावः) इन्द्रियें (पयसा) ज्ञान द्वारा (अभि, श्रीणन्ति) सेवन करती हैं और (सोमं) सोमगुणविशिष्ट आपको, (स्वर्विदं) जो आप देवताओं के लक्ष्यस्थानीय हैं, (मतिभिः) ब्रह्मविषयिणी बुद्धि द्वारा (पवते) विद्वान् लोग साक्षात्कार करते हैं। (धनञ्जय) आप धनञ्जय हैं। सम्पूर्ण धनों के जेता हैं। (कृत्व्यः) सब शक्तियों के केन्द्र हैं। (रसः) आनन्दरूप हैं। (विप्रः) मेधावी हैं। (कविः) सर्वज्ञ हैं। (काव्येन, स्वर्चनाः) अपनी सर्वशक्ति से सब लोक-लोकान्तरों के प्रलयकर्ता हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा पूर्वोक्त गुणों से सम्पन्न है, उसका ज्ञानयोगी अपने चित्तवृत्तिनिरोधरूपी योगद्वारा साक्षात्कार करते हैं ॥७॥ यह ८४ वाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्वर्चना: ' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (गावः) = वेदवाणीरूप गौएँ (पयसा) = अपने ज्ञानदुग्ध से (पयोवृधम्) = आप्यायन [ वृद्धि] के बढ़ानेवाले (त्यम्) = उस सोम को (अभिश्रीणन्ति) = अच्छी प्रकार परिपक्व करती हैं। इन ज्ञान की वाणियों के अध्ययन में लगे रहने से शरीर में सोम का सम्यक् रक्षण होता है। उस सोम को ये ज्ञानवाणियाँ परिपक्व करती हैं, जो (मतिभिः) = बुद्धियों के द्वारा (स्वर्विदम्) = प्रकाश को प्राप्त करानेवाला है । [२] (धनञ्जयः) = यह सब धनों का विजेता सोम (पवते) = हमें प्राप्त होता है । यह (कृत्व्यः) = कर्त्तव्य कर्मों के करने में कुशल है, (रसः) = जीवन को रसमय बनाता है । (विप्रः) = हमारा विशेषरूप से पूरण करनेवाला है, सब न्यूनताओं को दूर करता है । (कविः) = क्रान्तदशी है, हमारी अन्तर्दृष्टि को तीव्र बनाता है । (काव्येना) = इस अन्तर्दृष्टिवाले ज्ञान के द्वारा यह (स्वर्चना:) = [सु अर्चना] उत्तम अर्चन करनेवाला है। अथवा [स्व: चन: pleasure ] प्रकाशमय आनन्दवाला है, सुरक्षित सोम सम्यक सानन्द को देता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम ज्ञान को बढ़ाता है। ज्ञानवृद्धि करता हुआ यह हमारे लिये प्रकाशमय आनन्द को प्राप्त कराता है । गत मन्त्र के अनुसार सोमरक्षण से 'कवि व स्वर्चनाः' बनकर यह 'वेन' (मेधावी) बनता ज्ञान परिपक्व होने से 'भार्गव' कहलाता है, यह सोमशंसन करता हुआ कहता है कि-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे जगदीश ! (पयोवृधम्) ज्ञानवृद्धो भवान् (त्यम्) तं भवन्तं (गावः) इन्द्रियाणि (पयसा) ज्ञानद्वारा (अभि श्रीणन्ति) संसेवन्ते। अथ च (सोमम्) सौम्यगुणसम्पन्नं भवन्तं (स्वर्विदम्) देवतानां लक्ष्यस्थानीयं त्वां (मतिभिः) ब्रह्मविषयिणीभिर्बुद्धिभिः (पवते) विद्वांसः साक्षात्कुर्वते। भवान् (धनञ्जयः) सकलधनजेतास्ति। तथा (कृत्व्यः) सर्वासां शक्तीनां केन्द्रस्वरूपो भवान् (रसः) आमोदरूपोऽस्ति अथ च (विप्रः) मेधाव्यस्ति। (कविः) सर्वज्ञोऽस्ति। (काव्येन स्वर्चनाः) स्वीयाखिलशक्त्या सर्वलोकलोकान्तराणां प्रलयकर्तास्ति ॥५॥ इति चतुरशीतितमं सूक्तं नवमो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That divine Spirit of life and inspiration, joyous and omniscient, abounding in the life-giving energy of the universe, all senses and mind with higher intelligence and elevated thoughts join, perceive and present to the enlightened soul with the thrill of its radiance. Master giver of all wealth and excellence of life, the Spirit flows, vibrates and beatifies, all doer, all joy, all intelligent, all creative, and sublime as splendour of heaven by the beauty of poetic creation.