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ए॒ष स्य सोम॑: पवते सहस्र॒जिद्धि॑न्वा॒नो वाच॑मिषि॒रामु॑ष॒र्बुध॑म् । इन्दु॑: समु॒द्रमुदि॑यर्ति वा॒युभि॒रेन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑ क॒लशे॑षु सीदति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa sya somaḥ pavate sahasrajid dhinvāno vācam iṣirām uṣarbudham | induḥ samudram ud iyarti vāyubhir endrasya hārdi kalaśeṣu sīdati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । स्यः । सोमः॑ । प॒व॒ते॒ । स॒ह॒स्र॒ऽजित् । हि॒न्वा॒नः । वाच॑म् । इ॒षि॒राम् । उ॒षः॒ऽबुध॑म् । इन्दुः॑ । स॒मु॒द्रम् । उत् । इ॒य॒र्ति॒ । वा॒युऽभिः॑ । आ । इन्द्र॑स्य । हार्दि॑ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒ति॒ ॥ ९.८४.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:84» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रजित्) अनन्तशक्तिसम्पन्न परमात्मा विद्वानों की (इषिरां) ज्ञानप्रद (वाचं) वाणी को (उषर्बुधं) जो उषःकाल में जगानेवाली है, उसको (हिन्वानः) प्रेरणा करता हुआ (पवते) पवित्र बनाता है। (एषः स्यः सोमः) वह परमात्मा (इन्दुः) प्रकाशस्वरूप है और (समुद्रं) अन्तरिक्ष को (उदियर्ति) वर्षणशील बनाता है और (वायुभिः) अपनी ज्ञानरूपी शक्तियों से (इन्द्रस्य) ज्ञानयोगी के (हार्दि) हृदयव्यापी (कलशेषु) हृदयाकाश में (सीदति) स्थिर होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - “समुद्रमिति अन्तरिक्षनामसु पठितम्” नि० २।१०।७॥ समुद्रवन्त्यस्मादाप इति समुद्रः” जिससे जलों का प्रवाह बहे, उसका नाम यहाँ समुद्र है। तात्पर्य यह है कि जिस परमात्मा ने अन्तरिक्षलोक को वर्षणशील और पृथिवीलोक को दृढ़ता प्रदान की है, वह लोक-लोकान्तरों का पति परमात्मा अपनी ज्ञानगति से कर्मयोगी के हृदय में आकर विराजमान होता है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वाचम् शरिराम् उधबुर्धम्'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह (स्यः) = प्रसिद्ध (सोमः) = सोम पवते हमें प्राप्त होता है। यह (सहस्रजित्) = हमारे लिये हजारों धनों का विजय करनेवाला होता है। यह हममें अन्दर (वाचम्) = उस ज्ञान की वाणी को (हिन्वानः) = प्रेरित करता हुआ होता है, जो वाणी (इषिराम्) = हमें प्रेरणा को देनेवाली है और (उषर्बुधम्) = हमें उषाकाल में प्रबुद्ध करनेवाली है। यह प्रभु की वाणी हमें उषाकाल में जागने की प्रेरणा देती है । [२] (इन्दुः) = यह सोम (वायुभिः) = गतिशीलताओं के साथ (समुद्रम् उदियर्ति) = ज्ञान के समुद्र को हमारे अन्दर प्रेरित करता है । सोमरक्षण से हमारा ज्ञान बढ़ता है, और हम उस ज्ञान के अनुसार क्रियाशील जीवनवाले होते हैं। यह (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष का (हार्दि) = हृदय को प्रिय लगनेवाला सोम (कलशेषु सीदति) = सूक्ष्मरूप कलशों में, १६ कलाओं के आधारभूत इन शरीरों में (सीदति) = स्थित होता है। वस्तुतः सुरक्षित सोम ही सब कलाओं का आधार बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम सब वसुओं का विजय करता है। यह हमारे अन्दर ज्ञान की वाणियों को प्रेरित करता है। हमें प्रातः जागरणशील व गतिशील बनाता है, हमारा सारा जीवन इस सोम के कारण क्रियामय बना रहता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रजित्) अनन्तशक्तिसम्पन्नः परमेश्वरो विदुषां (इषिराम्) ज्ञानप्रदां (वाचम्) वाणीं (उषर्बुधम्) या हि उषःकाले प्रबोधयति तां (हिन्वानः) प्रेरयन् (पवते) पवित्रयति। (एषः स्यः सोमः) असावेषः सौम्यगुणसम्पन्नः परमेश्वरः (इन्दुः) प्रकाशस्वरूपोऽस्ति। अथ च (समुद्रम्) अन्तरिक्षं (उदियर्ति) वर्षणशीलं करोति। तथा (वायुभिः) स्वीयज्ञानशक्तिभिः (इन्द्रस्य) ज्ञानयोगिनः (हार्दि) हृदयव्यापिनि (कलशेषु) हृदयाकाशे (सीदति) स्थिरो भवति ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus this Soma flows, constant, victor of a thousand victories, energising and accelerating the sound of Aum, the Big Bang of creative manifestation in continuous motion that wakes and awakens at the dawn. Light, life and joy of existence, it rises to the oceans of space with the waves of cosmic energy and, being the joy of the soul’s heart core, it abides in all forms of life in existence (some know and care, others don’t, but it is there everywhere, all time).