वांछित मन्त्र चुनें

आ यो गोभि॑: सृ॒ज्यत॒ ओष॑धी॒ष्वा दे॒वानां॑ सु॒म्न इ॒षय॒न्नुपा॑वसुः । आ वि॒द्युता॑ पवते॒ धार॑या सु॒त इन्द्रं॒ सोमो॑ मा॒दय॒न्दैव्यं॒ जन॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yo gobhiḥ sṛjyata oṣadhīṣv ā devānāṁ sumna iṣayann upāvasuḥ | ā vidyutā pavate dhārayā suta indraṁ somo mādayan daivyaṁ janam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । यः । गोभिः॑ । सृ॒ज्यते॑ । ओष॑धीषु । आ । दे॒वाना॑म् । सु॒म्ने । इ॒षय॑न् । उप॑ऽवसुः । आ । वि॒ऽद्युता॑ । प॒व॒ते॒ । धार॑या । सु॒तः । इन्द्र॑म् । सोमः॑ । मा॒दय॑न् । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥ ९.८४.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:84» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) परमात्मा (दैव्यं, जनं) दिव्यगुणवाले (इन्द्रं) कर्म्मयोगी को (मादयन्) आनन्दित करता हुआ (उपावसुः) स्थिर होता है। (यः) जो परमात्मा (गोभिः) पृथिव्यादिकों की सूक्ष्म पञ्चतन्मात्राओं से लेकर (ओषधीषु, आ) ओषधियों तक (आसृज्यते) सब ब्रह्माण्डों को रचता हुआ और (देवानां) विद्वानों के (सुम्ने) सुख के लिये (इषयन्) इच्छा करता हुआ (विद्युता) विद्युत् रूपी शक्ति से सबको पवित्र करता है और (धारया, सुतः) सुधामय है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो विद्वान् पुरुष ईश्वरीय विद्या को प्राप्त होकर संसार की रक्षा करना चाहते हैं, परमात्मा उनके सुख की सदैव वृद्धि करता है ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विद्युता धारणा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (सोमः) = सोम (ओषधीषु) = ओषधियों में (आसृज्यते) = पैदा किया जाता है, अर्थात् जो सोम वानस्पतिक भोजनों के सेवन से उत्पन्न होता है, वह (गोभिः) = ज्ञान की वाणियों से [सृज्यते] संसृष्ट होता है। यह सोम (देवानाम्) = देववृत्ति के पुरुषों के (सुम्ने) = [ Hymn ] स्तोत्रों में (इषयन्) = गति करता हुआ (उपावसुः) = प्रभु की उपासना से सब वसुओं को प्राप्त करनेवाला होता है । सोमरक्षण से दिव्यवृत्ति बनती है, मनुष्य प्रभु-प्रवण बनता है और यह उपासना उसे सब जीवनधनों को प्राप्त करानेवाली होती है । [२] यह (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ सोम (विद्युता धारया) = विशिष्ट दीतिवाली धारणशक्ति से (पवते) = हमें प्राप्त होता है। यह सोम (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय (दैव्यं जनम्) = देव की उपासना में चलानेवाले मनुष्य को (मादयन्) = प्रसन्न करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण में वानस्पतिक भोजन सहायक होता है। सुरक्षित हुआ यह सोम ज्ञानदीप्ति को बढ़ाता है और उल्लास का कारण बनता है ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोमः) जगदुत्पादको जगदीश्वरः (दैव्यं जनम्) दिव्यगुणं (इन्द्रम्) कर्मयोगिनं (मादयन्) आनन्दयन् (उपावसुः) स्थिरो भवति। (यः) यः परमेश्वरः (गोभिः) पृथिव्यादिसूक्ष्म-पञ्चतन्मात्रमारभ्य (ओषधीषु, आ) ओषधिपर्यन्तं (आसृज्यते) सकलं ब्रह्माण्डं विरचयति। अथ च (देवानाम्) विद्वज्जनानां (सुम्ने) सुखस्य (इषयन्) इच्छां कुर्वन् (विद्युता) विद्युद्रूपशक्त्या सर्वान् पवित्रयति। अथ यः परमेश्वरः (धारया सुतः) स्वयमानन्दमयो वरीवर्ति ॥३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma who, abiding by all, wishing to create the beauty of variety for the good and self-fulfilment of all divine creations, creates the sap of life in herbs and trees with solar radiations, flows on with streams of energy, and when the presence is distilled and realised in the consciousness, Soma consecrates the soul of the karma- yogi and vibrates to the delight of divine humanity.