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पव॑स्व देव॒माद॑नो॒ विच॑र्षणिर॒प्सा इन्द्रा॑य॒ वरु॑णाय वा॒यवे॑ । कृ॒धी नो॑ अ॒द्य वरि॑वः स्वस्ति॒मदु॑रुक्षि॒तौ गृ॑णीहि॒ दैव्यं॒ जन॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pavasva devamādano vicarṣaṇir apsā indrāya varuṇāya vāyave | kṛdhī no adya varivaḥ svastimad urukṣitau gṛṇīhi daivyaṁ janam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पव॑स्व । दे॒व॒ऽमाद॑नः । विऽच॑र्षणिः । अ॒प्साः । इन्द्रा॑य । वरु॑णाय । वा॒यवे॑ । कृ॒धि । नः॒ । अ॒द्य । वरि॑वः । स्व॒स्ति॒ऽमत् । उ॒रु॒ऽक्षि॒तौ । गृ॒णी॒हि॒ । दैव्य॑म् । जन॑म् ॥ ९.८४.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:84» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवमादनः) हे विद्वानों के आनन्द के वृद्धक परमात्मन् ! (विचर्षणिरप्साः) हे कर्म्मों के द्रष्टा ! (इन्द्राय) कर्म्मयोगी के लिये (वरुणाय) विज्ञानी के लिए (वायवे) ज्ञानी के लिये (पवस्व) आप पवित्रता प्रदान करें और (नः) हमको (अद्य) इस समय (वरिवः) धनयुक्त करें तथा (स्वस्तिमत्) आप अपने ज्ञान से मुझे अविनाशी करें और (उरुक्षितौ) इस विस्तृत भूमण्डल में (जनं) इस जन को (दैव्यं) दिव्य बनाकर (गृणीहि) अनुग्रह करें ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों ! आप ज्ञानी-विज्ञानी बनकर कर्म्मों के नियन्ता देव से यह प्रार्थना करो कि हे भगवन् ! आप अपने ज्ञान द्वारा हमको अविनाशी बनाएँ और हमारी दरिद्रता मिटाकर आप हमको एश्वर्ययुक्त करें ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवमादनः विचर्षणिः अप्साः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! तू (देवमादनः) = देववृत्ति के पुरुषों को आनन्दित करनेवाला है, (विचर्षणिः) = विशिष्ट द्रष्टा है, बुद्धि को तीव्र बनाने के द्वारा वस्तुओं के तत्त्व को दिखानेवाला है, (अप्सा:) = कर्मों का सेवन करनेवाला है। सुरक्षित सोम हमें शक्ति सम्पन्न बनाकर क्रियाशील बनाता है । यह सोम (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये प्राप्त होता है, (वरुणाय) = द्वेष का निवारण करनेवाले के लिये प्राप्त होता है, (वायवे) = [वा गतौ] गतिशील के लिये प्राप्त होता है । सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि हम 'जितेन्द्रिय, निर्दोष व क्रियाशील' बनें। [२] हे सोम ! (अद्यः) = आज तू (नः) = हमारे लिये (स्वस्तिमत्) = कल्याण से युक्त (वरिवः) = धन को (कृधि) = कर तथा (उरुक्षितौ) = इस विशाल शरीर रूप पृथिवी में (दैव्यं जनम्) = देकर [प्रभु] की ओर चलनेवाले मनुष्य को (गृणीहि) = प्रात:- सायं ज्ञानपूर्वक स्तुति करनेवाला बना । इसके लिये तू ज्ञानोपदेश करनेवाला बन । सोमरक्षण ज्ञानाग्नि को दीप्त करके ज्ञानवर्धन का कारण होता है । सोम शरीर को विशाल व मन को प्रभु की ओर झुकाववाला और अतएव हमें स्तुतिवाला बनाता है । सोमरक्षण से ही ज्ञानाग्नि दीप्त होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये साधन है 'जितेन्द्रियता, निर्देषता व क्रियाशीलता' । सुरक्षित सोम हमारे शरीर व मन दोनों को ही स्वस्थ बनाता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (देवमादनः) विदुषामामोदकारकपरमात्मन् ! (विचर्षणिरप्साः) कर्मणां द्रष्टा (इन्द्राय) कर्मयोगिने (वरुणाय) विज्ञानिने (वायवे) ज्ञानयोगिने (पवस्व) त्वं पवित्रतां देहि अथ च (नः) अस्मान् (अद्य) अस्मिन् समये (वरिवः) धनिनः (कृधि) कुरु। तथा (स्वस्तिमत्) भवान् स्वकीयेन ज्ञानेन मामविनाशिनं करोतु। अथ च (उरुक्षितौ) विस्तृतेऽस्मिन् भूगर्भे (जनम्) अमुम्पुरुषं (दैव्यम्) दिव्यं विधाय (गृणीहि) अनुगृह्णातु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord inspirer of divines with joy, all watcher of the universal flow of karmic evolution, flow on with gifts of purity for Indra, ruling powers, Varuna, powers of judgement and knowledge, and Vayu, vibrant leaders and pioneers. Bless us now with wealth and excellence for well being, and in this great house of the world, pray, accept this noble humanity and raise it to be worthy of divine praise and grace.