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यथा॒ पूर्वे॑भ्यः शत॒सा अमृ॑ध्रः सहस्र॒साः प॒र्यया॒ वाज॑मिन्दो । ए॒वा प॑वस्व सुवि॒ताय॒ नव्य॑से॒ तव॑ व्र॒तमन्वाप॑: सचन्ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yathā pūrvebhyaḥ śatasā amṛdhraḥ sahasrasāḥ paryayā vājam indo | evā pavasva suvitāya navyase tava vratam anv āpaḥ sacante ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । पूर्वे॑भ्यः । श॒त॒ऽसाः । अमृ॑ध्रः । स॒ह॒स्र॒ऽसाः । प॒रि॒ऽअयाः॑ । वाज॑म् । इ॒न्दो॒ इति॑ । ए॒व । प॒व॒स्व॒ । सु॒वि॒ताय॑ । नव्य॑से । तव॑ । व्र॒तम् । अनु॑ । आपः॑ सचन्ते ॥ ९.८२.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:82» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे जीवात्मन् ! (यथा) जैसे (पूर्वेभ्यः) पूर्व जन्मों के लिये (शतसाः) सैकड़ों (सहस्रसाः) हजारों प्रकार के (वाजं) बलों को (पर्ययाः) तुम प्राप्त हुए (एव) इसी प्रकार (नव्यसे) इस नवीन जन्म के लिये (सुविताय) अभ्युदयार्थ (तव, व्रतं) तुम्हारे व्रत को (अनु, आपः) सत्कर्म्म (सचन्ते) संगत हों, इसलिये आप (पवस्व) पवित्र करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीवों ! तुम्हारे पूर्व जन्म बहुत व्यतीत हुए हैं, तुम इस नूतन जन्म में सत्कर्म करके अभ्युदयशाली और तेजस्वी बनो। यहाँ और उत्तर जन्मों का कथन सृष्टि को प्रवाहरूप से अनादि मानकर है और यही भाव ‘सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इस मन्त्र में वर्णन किया गया है ॥५॥ यह ८२ वाँ सूक्त और ७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'शतसाः सहस्रसा: ' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = सोम ! तू (यथा) = जैसे (पूर्वेभ्यः) = अपना पालन व पूरण करनेवालों के लिये (अमृध्रः) = हिंसा को न करनेवाला है, उन्हें हिंसित नहीं होने देता और (शतसा:) = उन्हें पूरे सौ वर्ष के आयुष्य को देनेवाला है (सहस्रसा:) = और हजारों वसुओं [धनों] को प्राप्त करानेवाला है। ऐसा तू (वाजं पर्ययाः) = शक्ति को हमारे अंगप्रत्यंगों में प्राप्त करानेवाला हो। [२] (एवा) = इसी प्रकार तू (नव्यसे) = अत्यन्त स्तुत्य [ नु स्तुतौ] (सुविताय) = सुवित के लिये, सदाचरण के लिये, (पवस्व) = प्राप्त हो । (तव व्रतम् अनु) = तेरे व्रत के अनुपात में ही, अर्थात् जितना जितना हम तेरा रक्षण करते हैं, उतना उतना ही (आपः सचन्ते) = व्यापक कर्म हमारे साथ सम्यक् होते हैं। सोमरक्षण के अनुपात में ही हमारे कर्म उद्भूता के लिये हुए व पवित्र होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें 'दीर्घजीवन, सब जीवनधन [वसु] शक्ति तथा पवित्र कर्मों' को प्राप्त कराता है। सोमरक्षण से पवित्र जीवनवाला 'पवित्र' ही अगले सूक्त का ऋषि है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे जीवात्मन् (यथा) येन प्रकारेण (पूर्वेभ्यः) पूर्वजन्मभ्यः (शतसाः)  शतशः तथा (सहस्रसाः) सहस्रशः (वाजम्) बलानि (पर्ययाः) त्वं प्राप्नोषि (एव) इत्थं (नव्यसे) अस्मै नव्यजन्मने (सुविताय) अभ्युदयाय (तव व्रतम्) भवद्व्रतं (अन्वापः) सत्कर्म (सचन्ते) सङ्गतं भवति अतस्त्वं (पवस्व) पवित्रय ॥५॥ इति द्व्यशीतितमं सूक्तं सप्तमो वर्गश्च समाप्तः ॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, Spirit of peace, prosperity and bliss vibrating in the dynamics of existence, free from violence, unviolated and inviolable, as you ever blest the ancients of all time with hundredfold, thousandfold food, energy, safeguards and victories of progress, same way, we pray, bring us peace, progress and well being for the new generations. All our people and all our actions honour and obey the law and discipline enshrined in the voice divine.