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प॒र्जन्य॑: पि॒ता म॑हि॒षस्य॑ प॒र्णिनो॒ नाभा॑ पृथि॒व्या गि॒रिषु॒ क्षयं॑ दधे । स्वसा॑र॒ आपो॑ अ॒भि गा उ॒तास॑र॒न्त्सं ग्राव॑भिर्नसते वी॒ते अ॑ध्व॒रे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

parjanyaḥ pitā mahiṣasya parṇino nābhā pṛthivyā giriṣu kṣayaṁ dadhe | svasāra āpo abhi gā utāsaran saṁ grāvabhir nasate vīte adhvare ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प॒र्जन्यः॑ । पि॒ता । म॒हि॒षस्य॑ । प॒र्णिनः॑ । नाभा॑ । पृ॒थि॒व्याः । गि॒रिषु॑ । क्षय॑म् । द॒धे॒ । स्वसा॑रः । आपः॑ । अ॒भि । गाः । उ॒त । अ॒स॒र॒न् । सम् । ग्राव॑ऽभिः । न॒स॒ते॒ । वी॒ते । अ॒ध्व॒रे ॥ ९.८२.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:82» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वीते, अध्वरे) पवित्र यज्ञों में (ग्रावभिः) रक्षा से आप (नसते) प्राप्त होते हैं (उत) और (गाः) पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों में (अभि असरन्) गति करते हुए (आपः) सर्वव्यापक आप (स्वसारः) स्वयं गतिशील होकर विराजमान होते हैं। आप कैसे हैं (पर्जन्यः) सबके तर्पक हैं और (पिता) सबके रक्षक हैं और (महिषस्य, पर्णिनः) बड़े से बड़े गतिशील पदार्थों के नियन्ता हैं और (पृथिव्याः, नाभा) पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों के केन्द्र होकर (गिरिषु) सब पदार्थों में (क्षयं, दधे) रक्षा को उत्पन्न करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा इस चराचर ब्रह्माण्ड का उत्पादक है और पर्जन्य के समान सबका तृप्तिकारक है। उसी परमात्मा से सब प्रकार की शान्ति और रक्षा उत्पन्न होती हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वानस्पतिक भोजन व सोमरक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] इस (महिषस्य) = महान् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गो महिमावाले (पर्णिन:) = पालन व पूरण करनेवाले सोम का (पर्जन्यः) = यह बादल ही पिता पितृ स्थानीय है। बादलों से हुई वृष्टि इसे जन्म देनेवाली ओषधियों, वनस्पतियों को उगाती है। वस्तुतः इन ओषधियों वनस्पतियों के सेवन से उत्पन्न सोम ही शरीर में रक्षणीय है। यह सोम (पृथिव्याः नाभा) = पृथिवी की नाभि में तथा (गिरिषु) = पर्वतों पर (क्षयं दधे) = निवास को धारण करता है। इस पृथिवी के क्षेत्रों में तथा पर्वतों पर उत्पन्न वनस्पतियाँ ही इस सोम को जन्म देती हैं। इन शब्दों से भी उसी बात पर बल दिया गया है कि हम वानस्पतिक पदार्थों का ही सेवन करें। इनसे उत्पन्न सोम ही हमारे लिये कल्याण कर होगा । [२] (स्वसार:) = [वनस्पतियों के सेवन से उत्पन्न सोम] हमें आत्मतत्त्व की ओर ले चलते हैं। (उत) = और (आपः) = रेतकण [ आपः रेतो भूत्वा० ] (गाः अभि असरन्) = ज्ञान की वाणियों की ओर गतिवाले होते हैं। यह सोम (वीते अध्वरे) = कान्त यज्ञों के होने पर जीवन में सुन्दर यज्ञात्मक कर्मों के चलने पर (ग्रावभिः संनसते) = स्रोता पुरुषों के साथ संगत होता है। अर्थात् सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि हम यज्ञात्मक कार्यों में लगे रहें, प्रभु स्तवन में प्रवृत्त हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के इच्छुक पुरुष को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिये कि वह वानस्पतिक पदार्थों का ही सेवन करे । सुरक्षित सोमरक्षण उसे ज्ञान प्राप्ति व आत्मतत्त्व की ओर ले चलेंगे। यज्ञों में लगे रहना व प्रभु स्तवन भी सोमरक्षण में साधक होते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वीते अध्वरे) पवित्रेषु यज्ञेषु (ग्रावभिः) रक्षया भवान् (नसते) प्राप्तो भवति (उत) अथ च (गाः) पृथिव्यादिलोकलोकान्तरेषु (अभि असरन्) गच्छन् (आपः) सर्वव्यापको भवान् (स्वसारः) स्वयं गतिशीलः सन् विराजमानो भवति। कथं भूतो भवान् (पर्जन्यः) सर्वतर्पकोऽस्ति अथ च (पिता) सर्वरक्षकोऽस्ति। तथा (महिषस्य पर्णिनः) महागतिशीलपदार्थानां नियन्तास्ति अथ च (पृथिव्याः, नाभा) पृथिव्यादिलोकलोकान्तराणां केन्द्रो भूत्वा (गिरिषु) सकलपदार्थेषु (क्षयं दधे) रक्षामुत्पादयति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Father and sustainer of all great and small, birds and trees, serious realists and flying dreamers, centre hold of the earth and showers of rain, you abide in the mighty clouds and over the mountains. Your waves and vibrations flow and radiate, flow as sister streams and radiate to the stars and planets, and in holy yajna you vibrate with the music of soma stones and the chant of high priests.