वानस्पतिक भोजन व सोमरक्षण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] इस (महिषस्य) = महान् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गो महिमावाले (पर्णिन:) = पालन व पूरण करनेवाले सोम का (पर्जन्यः) = यह बादल ही पिता पितृ स्थानीय है। बादलों से हुई वृष्टि इसे जन्म देनेवाली ओषधियों, वनस्पतियों को उगाती है। वस्तुतः इन ओषधियों वनस्पतियों के सेवन से उत्पन्न सोम ही शरीर में रक्षणीय है। यह सोम (पृथिव्याः नाभा) = पृथिवी की नाभि में तथा (गिरिषु) = पर्वतों पर (क्षयं दधे) = निवास को धारण करता है। इस पृथिवी के क्षेत्रों में तथा पर्वतों पर उत्पन्न वनस्पतियाँ ही इस सोम को जन्म देती हैं। इन शब्दों से भी उसी बात पर बल दिया गया है कि हम वानस्पतिक पदार्थों का ही सेवन करें। इनसे उत्पन्न सोम ही हमारे लिये कल्याण कर होगा । [२] (स्वसार:) = [वनस्पतियों के सेवन से उत्पन्न सोम] हमें आत्मतत्त्व की ओर ले चलते हैं। (उत) = और (आपः) = रेतकण [ आपः रेतो भूत्वा० ] (गाः अभि असरन्) = ज्ञान की वाणियों की ओर गतिवाले होते हैं। यह सोम (वीते अध्वरे) = कान्त यज्ञों के होने पर जीवन में सुन्दर यज्ञात्मक कर्मों के चलने पर (ग्रावभिः संनसते) = स्रोता पुरुषों के साथ संगत होता है। अर्थात् सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि हम यज्ञात्मक कार्यों में लगे रहें, प्रभु स्तवन में प्रवृत्त हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के इच्छुक पुरुष को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिये कि वह वानस्पतिक पदार्थों का ही सेवन करे । सुरक्षित सोमरक्षण उसे ज्ञान प्राप्ति व आत्मतत्त्व की ओर ले चलेंगे। यज्ञों में लगे रहना व प्रभु स्तवन भी सोमरक्षण में साधक होते हैं ।