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आ न॑: पू॒षा पव॑मानः सुरा॒तयो॑ मि॒त्रो ग॑च्छन्तु॒ वरु॑णः स॒जोष॑सः । बृह॒स्पति॑र्म॒रुतो॑ वा॒युर॒श्विना॒ त्वष्टा॑ सवि॒ता सु॒यमा॒ सर॑स्वती ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā naḥ pūṣā pavamānaḥ surātayo mitro gacchantu varuṇaḥ sajoṣasaḥ | bṛhaspatir maruto vāyur aśvinā tvaṣṭā savitā suyamā sarasvatī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । नः॒ । पू॒षा । पव॑मानः । सु॒ऽरा॒तयः॑ । मि॒त्रः । ग॒च्छ॒न्तु॒ । वरु॑णः । स॒ऽजोष॑सः । बृह॒स्पतिः॑ । म॒रुतः॑ । वा॒युः । अ॒श्विना॑ । त्वष्टा॑ । स॒वि॒ता । सु॒ऽयमा॑ । सर॑स्वती ॥ ९.८१.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:81» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:6» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (नः) हमको (पूषा) धर्म्मोपदेश द्वारा पुष्टि करनेवाला विद्वान् (पवमानः) पथ्यापथ्य बताकर पवित्र करनेवाला विद्वान् (सुरातयः) दानशील विद्वान् (मित्रः) सबसे मैत्री करनेवाला विद्वान् (वरुणः) सबका वशीभूत करनेवाला विद्वान् (बृहस्पतिः) वाणियों के पति (मरुतः) ज्ञानयोगी (वायुः) कर्म्मयोगी (अश्विना) कर्म्म और ज्ञानयोगी दोनों (त्वष्टा) कार्य्य करने में समर्थ विद्वान् (सविता) उत्तमोत्तम पदार्थों का निर्माता विद्वान् (सुयमा) सबको नियम में रखनेवाला विद्वान् (सरस्वती) ज्ञान को सर्वोपरि भूषणरूप से धारण करनेवाला विद्वान्, ये सब पूर्वोक्त विद्वान् (नः) हमको (आगच्छन्तु) प्राप्त हों ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है, कि हे मनुष्यों ! तुम सामाजिक उन्नति के लिये पूर्वोक्त विद्वान् का संग्रह करो, ताकि तुम सब विद्याओं में निपुण होकर संसार में अभ्युदयशाली बनो ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सोमरक्षण से सर्वदेव प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] सोमरक्षण के होने पर (नः) = हमारे लिये (सुरातयः) = सब उत्तमताओं को देनेवाले (सजोस:) परस्पर संगत 'पूषा पवमानः मित्रः व वरुणः 'पूषा आदि देव (आगच्छन्तु) = प्राप्त हों। हम अच्छी प्रकार अपना पोषण करनेवाले हों, पवित्रता को सिद्ध करें, सब के प्रति स्नेहवाले हों, द्वेष का निवारण करनेवाले हों। [२] इसी प्रकार हमें (त्वष्टा) = त्वष्टा की प्राप्ति हो। हम दीप्तिमय जीवनवाले हों। [त्विष्] अथवा निर्माण के कार्यों में प्रवृत्त हों [त्वक्ष्] । (सविता) = सविता की हमें प्राप्ति हो ? हम ऐश्वर्य का उत्पादन करनेवाले हों । (सुयमा) = उत्तम संयमवाली (सरस्वती) = ज्ञान की अधिष्ठातृ देवता हमें प्राप्त हो । (बृहस्पतिः) = ज्ञान का स्वामी प्रभु हमें प्राप्त हो। (मरुतः) = प्राण हमें प्राप्त हों । (वायुः) = गतिशीलता तथा (अश्विनौ) = [सूर्याचन्द्रमसौ] सूर्य व चन्द्र हमें प्राप्त हों। हमारे जीवन में सूर्य व चन्द्र का समन्वय हो । सूर्य 'उष्णता' का प्रतीक है और चन्द्र 'शीतलता' का । हमारे जीवन में दोषों का सुन्दर समन्वय होकर क्रियाशीलता बनी रहे ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हमारा जीवन सर्वदेवमय बनता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - हे परमात्मन् ! (नः) अस्मान् (पूषा) धर्मोपदेशेन पुष्टिकारको विद्वान् (पवमानः) पथ्यापथ्यमुक्त्वा पवित्रकारको मनीषी (सुरातयः) दानशीलः (मित्रः) सर्वप्रियः (वरुणः) सर्ववशकारकः (बृहस्पतिः) वाक्पतिः (मरुतः) ज्ञानयोगी (वायुः) कर्मयोगी (अश्विना) कर्मयोगिज्ञानयोगिनावुभावपि (त्वष्टा) कार्यकरणे समर्थौ (सविता) उत्तमोत्तमपदार्थ-निर्मातारौ। (सुयमा) सर्वनियामकौ (सरस्वती) ज्ञानभूषकौ विद्वांसौ (आगच्छन्तु) प्राप्नुतः। छान्दसत्वात् “व्यत्ययेन द्विवचनस्थाने बहुवचनम्” ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the generous divinities of holy abundance both in nature and humanity come and grace us with their gifts : Pusha, giver of good health and long age, Pavamana, fluent powers of purity and purification, Mitra, powers of love and friendship, Varuna, powers of judgement, discrimination, freedom and discipline, Brhaspati, powers of environment and space, knowledge and communication, Maruts, vibrant defence forces, Vayu, dynamic leaders and pioneers, Ashvins, complementary powers of social system with knowledge of theory and practice, Tvashta, designers and makers of things and systems, Savita, creators, generators, givers of light and inspiration, Suyama, powers of law and discipline, Sarasvati, mother giver of knowledge and living tradition. May all these come and bless with the spirit of love.