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तं त्वा॑ ह॒स्तिनो॒ मधु॑मन्त॒मद्रि॑भिर्दु॒हन्त्य॒प्सु वृ॑ष॒भं दश॒ क्षिप॑: । इन्द्रं॑ सोम मा॒दय॒न्दैव्यं॒ जनं॒ सिन्धो॑रिवो॒र्मिः पव॑मानो अर्षसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ tvā hastino madhumantam adribhir duhanty apsu vṛṣabhaṁ daśa kṣipaḥ | indraṁ soma mādayan daivyaṁ janaṁ sindhor ivormiḥ pavamāno arṣasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । त्वा॒ । ह॒स्तिनः॑ । मधु॑ऽमन्तम् । अद्रि॑ऽभिः । दु॒हन्ति॑ । अ॒प्ऽसु । वृ॒ष॒भम् । दश॑ । क्षिपः॑ । इन्द्र॑म् । सो॒म॒ । मा॒दय॑न् । दैव्य॑म् । जन॑म् । सिन्धोः॑ऽइव । ऊ॒र्मिः । पव॑मानः । अ॒र्ष॒सि॒ ॥ ९.८०.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:80» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तं त्वा) पूर्वोक्त गुणसम्पन्न आपको जो (वृषभम्) जो सब कामनाओं की वृष्टि करता है (दश क्षिपः) दश प्राण (अद्रिभिः) अपनी शक्तियों से (हस्तिनः) स्वच्छतायुक्त (अप्सु) कर्म्मविषयक (दुहन्ति) दुहते हैं। (सोम) हे परमात्मन् ! (इन्द्रं दैव्यं जनम्) दिव्यगुणसम्पन्न कर्म्मयोगी को (मादयन्) आनन्द देते हुए (सिन्धोरिव ऊर्मिः) समुद्र की लहरों के समान (पवमानः) पवित्र करते हुए (अर्षसि) प्राप्त होते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष कर्म्मयोग वा ज्ञानयोग द्वारा अपने आपको परमात्मा की कृपा का पात्र बनाते हैं, परमात्मा उन्हें सिन्धु की लहरों के समान अपने आनन्दरूपी वारि से सिञ्चित करता है ॥५॥ यह अस्सीवाँ सूक्त और पाचवाँ वर्ग समाप्त हुआ।
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'मधुमान् वृषभ' सोम

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! (तंत्वा) = उस तुझको (हस्तिनः) = उत्तम हाथोंवाले, (अद्रिभिः) = उपासनाओं के साथ प्राप्त कर्मों में प्रवृत्त होकर (दशक्षिपः) = दसों इन्द्रियों के विषयों को अपने से परे फेंकनेवाले लोग (दुहन्ति) = अपने में प्रपूरित करते हैं। भूमि में सुरक्षित हुआ हुआ तू (मधुमन्तम्) = अत्यन्त माधुर्यवाला है, (वृषभम्) = जीवन को शक्तिशाली बनानेवाला है। [२] हे सोम ! तू (इन्द्रम्) = जितेन्द्रिय पुरुष को तथा (दैव्यं जनम्) = प्रभु की ओर चलनेवाले दैव्यजन को (मादयन्) = आनन्दित करता हुआ, (सिन्धोः ऊर्मि इव) = समुद्र की लहर की तरह (पवमानः) = पवित्र करता हुआ (अर्षसि) = प्राप्त होता है। समुद्र की लहर आती है और समुद्रतट के सारे कूड़े-करकट को बहा ले जाती है। इसी प्रकार सोम सब मलिनताओं को दूर करनेवाला है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रशस्त हाथोंवाले बनकर, प्रभु स्मरण पूर्वक कार्यों में लगे रहना ही सोमरक्षण का साधन है। यह जीवन को मधुर व शक्तिशाली बनाता है। जीव को पवित्र कर डालता है। अगला सूक्त भी 'वसु भारद्वाज' का ही है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (तं त्वा) प्रागुक्तगुणसम्पन्नं त्वां (वृषभम्) कामनावर्षकं परमात्मानं (दश क्षिपः) दशसङ्ख्याकाः प्राणाः (अद्रिभिः) स्वशक्तिभिः (हस्तिनः) स्वच्छतापूर्वकं (अप्सु) कर्मविषये (दुहन्ति) दुहते। (सोम) हे परमात्मन् ! (इन्द्रं दैव्यं जनम्) दिव्यगुणसम्पन्नं कर्मयोगिनं (मादयन्) आनन्दयन् (सिन्धोरिव ऊर्मिः) समुद्रवीचिरिव (पवमानः) पवित्रयन् त्वं (अर्षसि) प्राप्तो भवसि ॥५॥ इत्यशीतितमं सूक्तं पञ्चमो वर्गश्च समाप्तः।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Such as you are, Soma, sweetest presence of bliss, infinitely generous, men of mighty arm for action and ten senses of intense perception, will and imagination experience your presence and realise the message in their actions, manners and behaviour. O spirit of light and bliss, pure and purifying, like waves of the sea you roll on giving delight and beatitude to the ruling soul and general humanity blest with love of divinity.