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एन्द्र॑स्य कु॒क्षा प॑वते म॒दिन्त॑म॒ ऊर्जं॒ वसा॑न॒: श्रव॑से सुम॒ङ्गल॑: । प्र॒त्यङ्स विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प॑प्रथे॒ क्रीळ॒न्हरि॒रत्य॑: स्यन्दते॒ वृषा॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

endrasya kukṣā pavate madintama ūrjaṁ vasānaḥ śravase sumaṅgalaḥ | pratyaṅ sa viśvā bhuvanābhi paprathe krīḻan harir atyaḥ syandate vṛṣā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । इन्द्र॑स्य । कु॒क्षा । प॒व॒ते॒ । म॒दिन्ऽत॑मः । ऊर्ज॑म् । वसा॑नः । श्रव॑से । सु॒ऽम॒ङ्गलः॑ । प्र॒त्यङ् । सः । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । प॒प्र॒थे॒ । क्रीळ॑न् । हरिः॑ । अत्यः॑ । स्य॒न्द॒ते॒ । वृषा॑ ॥ ९.८०.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:80» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:5» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (श्रवसे) सर्वोपरि बल के लिये (सुमङ्गलः) मङ्गलरूप है। (ऊर्जं वसानः) सबका प्राणाधार होकर विराजमान हो रहा है। (मदिन्तमः) सबका आनन्दकारक है। (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (कुक्षा) अन्तःकरण में (आ पवते) पवित्रता प्रदान करता है, (सः) वह परमात्मा (प्रत्यङ्) सर्वव्यापक है और (विश्वा भुवना) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को (अभि पप्रथे) रचता है। (हरिः) वह अनन्तबलयुक्त परमात्मा (क्रीळन्) क्रीडा करता हुआ और (अत्यः) सर्वव्यापक होकर और (वृषा) आनन्द का वर्षक होकर (स्यन्दते) अपनी व्यापक शक्ति द्वारा सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऊर्जं वसानः श्रवसे सुमंगल:

पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह (मदिन्तमः) = अतिशयित आनन्द का जनक सोम (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (कुक्षा आ पवते) = कुक्षिदेश में सर्वथा प्राप्त होता है, अर्थात् उसके अन्दर ही सुरक्षित रहता है। वहाँ (ऊर्जं वसानः) = बल व प्राणशक्ति को यह धारित करता है । श्रवसे ज्ञान प्राप्ति के लिये होता है और इस प्रकार (सुमंगलः) = उत्तम कल्याण का कारण बनता है। [२] (प्रत्यड्) = [प्रति अञ्छति] शरीर के अन्दर ही गतिवाला होता हुआ (सः) = वह सोम (विश्वा भुवना) = शरीर के सब अंगों को अभि पप्रथे विस्तृत शक्तिवाला करता है। क्रीडन् शरीर में ही विहार करता हुआ यह सोम (हरिः) = सब दुःखों का हरण करनेवाला होता है । (अत्यः) = निरन्तर गतिशील होता हुआ यह (स्पन्दते) = शरीर में प्रवाह रहित होता है, अपने रक्षक को यह क्रियाशील बनाता है। (वृषा) = शक्तिशाली होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम 'उल्लास- शक्ति - ज्ञान व मंगल' का साधक होता है। शरीर में ही विहरण करता हुआ सोम हमारे रोगों का हरण तो करता ही है, यह हमें गतिशील बनाकर शक्ति-सम्पन्न बनाये रखता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (श्रवसे) सर्वोत्कृष्टबलाय (सुमङ्गलः) मङ्गलरूपोऽस्ति। (ऊर्जं वसानः) तथा सर्वेषां जीवनाधारो भूत्वा विराजमानोऽस्ति। तथा (मदिन्तमः) सकलामोद- दायकोऽस्ति। (इन्द्रस्य) कर्मयोगिनः (कुक्षा) अन्तःकरणं (आ पवते) पुनाति (सः) असौ परमात्मा (प्रत्यङ्) सर्वव्यापकोऽस्ति। अथ च (विश्वा भुवना) सकल लोकलोकान्तराणि (अभि पप्रथे) निर्मिमीते। (हरिः) सोऽनन्तबलयुक्तः परमात्मा (क्रीळन्) क्रीडां कुर्वन् तथा (अत्यः) सर्वत्र व्याप्नुवन् अथ च (वृषा) आनन्दं ददन् (स्यन्दते) स्वकीयव्यापकशक्त्या सर्वत्र परिपूर्णोऽस्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The stream of Soma divinity most joyous and exhilarating, radiating energy, auspicious harbinger of good fortune, honour and excellence, purifies and vibrates in the heart and soul of man. All pervasive, Soma generates and extends all regions of the universe, playful, beatific saviour, infinite mover, and it continues to flow in boundless omnipresence, a fact of direct observation and experience for the wise.