म॒घोन॒ आ प॑वस्व नो ज॒हि विश्वा॒ अप॒ द्विष॑: । इन्दो॒ सखा॑य॒मा वि॑श ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
maghona ā pavasva no jahi viśvā apa dviṣaḥ | indo sakhāyam ā viśa ||
पद पाठ
म॒घोनः॑ । आ । प॒व॒स्व॒ । नः॒ । ज॒हि । विश्वाः॑ । अप॑ । द्विषः॑ । इन्दो॒ इति॑ । सखा॑यम् । आ । वि॒श॒ ॥ ९.८.७
ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:8» मन्त्र:7
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:31» मन्त्र:2
| मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:7
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमैश्वर्यवाले परमात्मन् ! आप (मघोनः) हमको ऐश्वर्यसम्पन्न करें (आ, पवस्व) और सब प्रकार से पवित्र करें (विश्वा) सब (अप, द्विषः) दुष्टों का नाश करें और (सखायम् आविश) सज्जनों को सर्वत्र फैलायें ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषों ! तुम इस प्रकार के प्रार्थनारूप भाव को हृदय में उत्पन्न करो कि तुम्हारे सत्कर्मी सज्जनों की रक्षा हो और दुष्टों का नाश हो ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
यज्ञशीलता व प्रभु मित्रता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] [मघवान्-मखवान्] हे सोम ! (मघोनः) = यज्ञशील (नः) = हमें (आपवस्व) = सर्वथा प्राप्त हो । हमें प्राप्त होकर तू (विश्वाः द्विषः) = सब द्वेष की भावनाओं को (अपजहि) = हमारे से दूर कर । सदा यज्ञों में लगे रहने पर सोम का शरीर में सुरक्षित होना स्वाभाविक है । सोम के सुरक्षित होने पर हमारे जीवनों में 'ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध' नहीं रहते । [२] (इन्दो) = हे शक्ति का संचार करनेवाले सोम ! (सखायम्) = प्रभु का मित्रभूत मुझे (आविश) = समन्तात् प्राप्त हो। मैं प्रभु का मित्र बनूँ । प्रभु का मित्र बनने पर वासनाओं से मैं आक्रान्त न हूँगा और सोम को शरीर में ही व्याप्त करके 'नीरोग निर्मल व दीप्त' बन पाऊँगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञशील व प्रभु के मित्र बनकर हम सोम को अपने अन्दर सुरक्षित करें ।
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आर्यमुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) हे परमैश्वर्यसम्पन्न परमात्मन् ! भवान् (नः, मघोनः) अस्मान्विविधधनवतः कुरुताम् (आ, पवस्व) सर्वथा पावयतु च (विश्वा) सर्वान् (अप, द्विषः) दुष्टान् अपहन्तु तथा (सखायम्) सज्जनान् (आविश) सर्वत्र तनोतु च ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Lord of peace and bliss, come and purify the devotees, men of wealth, power and honour, and ward off all our negativities, oppositions, jealousies and enmities from us and bless us all to live together as friends.
