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दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒ मदा॑य॒ कं सृ॑जा॒नमति॑ मे॒ष्य॑: । सं गोभि॑र्वासयामसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

devebhyas tvā madāya kaṁ sṛjānam ati meṣyaḥ | saṁ gobhir vāsayāmasi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दे॒वेभ्यः॑ । त्वा॒ । मदा॑य । कम् । सृ॒जा॒नम् । अति॑ । मे॒ष्यः॑ । सम् । गोभिः॑ । वा॒स॒या॒म॒सि॒ ॥ ९.८.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:8» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:30» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:5


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मेष्यः) अज्ञान की वृत्तियें (सृजानम्) संसार के रचनेवाले तुमको (अति) अतिक्रमण कर जाती हैं (देवेभ्यः, त्वा) दिव्य वृत्तियोंवाले देवताओं के लिये तुम्हारा (कम्) आनन्द (मदाय) आह्लाद के लिये हो, ताकि हम आपको (सम्) भली प्रकार (गोभिः) इन्द्रियों द्वारा (वासयामसि) निवास देवें ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष अज्ञानी हैं, उनकी बुद्धि का विषय ईश्वर नहीं होता, इसलिये कहा गया है कि उनकी बुद्धि को अतिक्रमण कर जाता है और जो लोग शुद्ध इन्द्रियोंवाले हैं, वे लोग उसको बुद्धि का विषय बनाकर आनन्द को उपलब्ध करते हैं ॥५॥३०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवेभ्यः-मदाय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'मिष' धातु छिड़कने अर्थ में आती है [To sprinkle]। यह सोम (अति मेष्यः) = अतिशयेन शरीर में ही छिड़कने योग्य है, अर्थात् इसे नष्ट न होने देकर शरीर में ही व्याप्त करना ठीक है हे सोम ! तू' अतिमेष्य' है, सो (कं सृजानम्) = आनन्द को उत्पन्न करनेवाले (त्वा) = तुझ को (देवेभ्यः) = दिव्य गुणों की उत्पत्ति के लिये तथा (मदाय) = जीवन को उल्लासमय बनाने के लिये (गोभिः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (सं वासयामसि) = सम्यक् आच्छादित करते हैं, तुझे धारण करने का प्रयत्न करते हैं । [२] ज्ञान की वाणियों के द्वारा सोम के धारण का भाव यह है कि जब हम मन को इन ज्ञानवाणियों में व्यापृत करते हैं तो मन विषयों से व्यावृत्त होता है। वासनाओं का अबाल न आने से सोम का रक्षण होता है। यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बन आता है। इस प्रकार इसका विनियोग बुद्धि को सूक्ष्म करने व ज्ञानदीप्ति में हो जाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम दिव्य गुणों के विकास का व उल्लास का साधन बनता है। स्वाध्याय की प्रवृत्ति हमें सोमरक्षण में सहायक होती है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मेष्यः) अज्ञानवृत्तयः (सृजानम्) संसारस्य रचयितारम्भवन्तम् (अति) अतिक्रामन्ति। (देवेभ्यः, त्वा) दिव्यवृत्तयो ये देवास्तेभ्यः त्वदीयः (कम्) आनन्दः, (मदाय) आह्लादाय भवतु, येन वयं भवन्तम् (सम्) सम्यक् (गोभिः) इन्द्रियैः (वासयामसि) वासयाम ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Soma, man of peace and joy, while you are creating psychic and spiritual joy for the service and pleasure of nature and noble humanity, we, generous mother powers and sagely scholars, nourish and enlighten you with milk and noble voices of wisdom and vision of divinity.