पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (परम:) = [ परः मीयते येन] प्रभु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला व्यक्ति है वह हे सोम ! (ते) = तेरे (नाभा) = बन्धन के करनेवाले (दिवि) = ज्ञान में (आददे) = तेरा ग्रहण करता है, अर्थात् ज्ञान प्राप्ति में तत्पर होकर तुझे अपने अन्दर बाँधनेवाला बनता है। (ते) = वे तुझे अपने अन्दर बाँधनेवाले (क्षिपः) = वासनाओं व रोगों को अपने से दूर फेंकनेवाले लोग (पृथिव्याः सानवि) = इस शरीर रूप पृथिवी के शिखर पर (रुरुहुः) = आरूढ़ होते हैं, अधिक से अधिक उन्नति कर पाते हैं, इस शरीर को पूर्ण स्वस्थ बना पाते हैं । [२] (अद्रयः) = प्रभु के उपासक [अद्रि= one who adores], हे सोम ! (गो:) = इन ज्ञान-वाणियों के (अधि) = आधिक्येन (त्वचि) = सम्पर्क में (त्वा) = तुझे बप्सति खाते हैं, अपने अन्दर ही व्याप्त करते हैं। सोमरक्षण के लिये उपासना व स्वाध्याय ही मुख्य साधन हैं। ये (मनीषिणः) = ज्ञानी पुरुष (हस्तै:) = हाथों से (अप्सु) = कर्मों में लगे रहकर (त्वा) = तुझे (दुदुहुः) = अपने अन्दर प्रपूरित करते हैं । एवं कर्मों में लगे रहना हमें वासनाओं के आक्रमण से बचाता है और हम सोम का रक्षण कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि [ अद्रयः] उपासनामय हमारा जीवन हो, [गो: त्वचि = in touch ] हम सदा ज्ञान के सम्पर्क में हों [अप्सु] कर्मों में लगे रहें । रक्षित सोम हमें द्युलोक व पृथिवीलोक के शिखर पर पहुँचायेगा, अर्थात् हमारे मस्तिष्क व शरीर को उन्नत करेगा।