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दि॒वि ते॒ नाभा॑ पर॒मो य आ॑द॒दे पृ॑थि॒व्यास्ते॑ रुरुहु॒: सान॑वि॒ क्षिप॑: । अद्र॑यस्त्वा बप्सति॒ गोरधि॑ त्व॒च्य१॒॑प्सु त्वा॒ हस्तै॑र्दुदुहुर्मनी॒षिण॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

divi te nābhā paramo ya ādade pṛthivyās te ruruhuḥ sānavi kṣipaḥ | adrayas tvā bapsati gor adhi tvacy apsu tvā hastair duduhur manīṣiṇaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दि॒वि । ते॒ । नाभा॑ । प॒र॒मः । यः । आ॒ऽद॒दे । पृ॒थि॒व्याः । ते॒ । रु॒रु॒हुः॒ । सान॑वि । क्षिपः॑ । अद्र॑यः । त्वा॒ । ब॒प्स॒ति॒ । गोः । अधि॑ । त्व॒चि । अ॒प्ऽसु । त्वा॒ । हस्तैः॑ । दु॒दु॒हुः॒ । म॒नी॒षिणः॑ ॥ ९.७९.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:79» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:4


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मनीषिणः) मेधावी लोग (त्वा) तुमको (हस्तैः) ज्ञानयोग कर्म्मयोगादि साधनों द्वारा (दुदुहुः) साक्षात्कार करते हैं और उनकी (अद्रयः) चित्तवृत्तियाँ (गोरधि त्वचि) अपने मन से (अप्सु) कर्म्मों के लिये (त्वा) तुमको (बप्सति) ग्रहण करती हैं। हे सोम ! (ते) तुम्हारे (दिवि नाभा) लोक-लोकान्तरों के बन्धनरूप द्युलोक में (यः) जो पुरुष (आददे) तुमको ग्रहण करता है, वह (परमः) सर्वोत्कृष्ट होता है और (ते) तुम्हारे (पृथिव्याः) पृथिवीलोक के (सानवि) उच्चशिखर में (क्षिपः) रक्खा हुआ (रुरुहुः) उत्पन्न होता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो लोग चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे परमात्मा की विभूति में सर्वोपरि होकर विराजमान होते हैं ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शिखर पर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (परम:) = [ परः मीयते येन] प्रभु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला व्यक्ति है वह हे सोम ! (ते) = तेरे (नाभा) = बन्धन के करनेवाले (दिवि) = ज्ञान में (आददे) = तेरा ग्रहण करता है, अर्थात् ज्ञान प्राप्ति में तत्पर होकर तुझे अपने अन्दर बाँधनेवाला बनता है। (ते) = वे तुझे अपने अन्दर बाँधनेवाले (क्षिपः) = वासनाओं व रोगों को अपने से दूर फेंकनेवाले लोग (पृथिव्याः सानवि) = इस शरीर रूप पृथिवी के शिखर पर (रुरुहुः) = आरूढ़ होते हैं, अधिक से अधिक उन्नति कर पाते हैं, इस शरीर को पूर्ण स्वस्थ बना पाते हैं । [२] (अद्रयः) = प्रभु के उपासक [अद्रि= one who adores], हे सोम ! (गो:) = इन ज्ञान-वाणियों के (अधि) = आधिक्येन (त्वचि) = सम्पर्क में (त्वा) = तुझे बप्सति खाते हैं, अपने अन्दर ही व्याप्त करते हैं। सोमरक्षण के लिये उपासना व स्वाध्याय ही मुख्य साधन हैं। ये (मनीषिणः) = ज्ञानी पुरुष (हस्तै:) = हाथों से (अप्सु) = कर्मों में लगे रहकर (त्वा) = तुझे (दुदुहुः) = अपने अन्दर प्रपूरित करते हैं । एवं कर्मों में लगे रहना हमें वासनाओं के आक्रमण से बचाता है और हम सोम का रक्षण कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के लिये आवश्यक है कि [ अद्रयः] उपासनामय हमारा जीवन हो, [गो: त्वचि = in touch ] हम सदा ज्ञान के सम्पर्क में हों [अप्सु] कर्मों में लगे रहें । रक्षित सोम हमें द्युलोक व पृथिवीलोक के शिखर पर पहुँचायेगा, अर्थात् हमारे मस्तिष्क व शरीर को उन्नत करेगा।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मनीषिणः) मेधाविनो जनाः (त्वा) त्वां (हस्तैः) ज्ञानयोगकर्मयोगादिसाधनैः (दुदुहुः) साक्षात्कुर्वते अथ च तेषां (अद्रयः) चित्तवृत्तयः (गोरधि त्वचि) स्वमनसि (अप्सु) कर्मभ्यः (त्वा) भवन्तं (बप्सति) गृह्णन्ति। हे परमात्मन् ! (ते) तव (दिवि नाभा) लोक-लोकान्तरस्य बन्धनरूपद्युलोके (यः) यः पुरुषः (आददे) त्वां गृह्णाति स (परमः) सर्वोत्कृष्टो भवति । अथ च (ते) तव (पृथिव्याः) पृथ्वीलोकस्य (सानवि) उपरिभागे (क्षिपः) धृतः सन् (रुरुहुः) उत्पद्यते ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The supreme power and bliss of yours, which captivates and holds, abides in the centre of the regions of light. The inspirations for the light arise here on top of the earth. The veteran wise exalt you in the vedi on the floor of the earth, and thinkers and seekers distil the bliss in their actions as they milk the cow with their hands for milk.