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प्र णो॑ धन्व॒न्त्विन्द॑वो मद॒च्युतो॒ धना॑ वा॒ येभि॒रर्व॑तो जुनी॒मसि॑ । ति॒रो मर्त॑स्य॒ कस्य॑ चि॒त्परि॑ह्वृतिं व॒यं धना॑नि वि॒श्वधा॑ भरेमहि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra ṇo dhanvantv indavo madacyuto dhanā vā yebhir arvato junīmasi | tiro martasya kasya cit parihvṛtiṁ vayaṁ dhanāni viśvadhā bharemahi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । नः॒ । ध॒न्व॒न्तु॒ । इन्द॑वः । म॒द॒ऽच्युतः॑ । धना॑ । वा॒ । येभिः॑ । अर्व॑तः । जु॒नी॒मसि॑ । ति॒रः । मर्त॑स्य । कस्य॑ । चि॒त् । परि॑ऽह्वृतिम् । व॒यम् । धना॑नि । वि॒श्वऽधा॑ । भ॒रे॒म॒हि॒ ॥ ९.७९.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:79» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मदच्युतः) सबको आनन्द देनेवाला परमात्मा (इन्दवः) जो प्रकाशस्वरूप है, वह (नः) हमको (प्रधन्वन्तु) प्राप्त हो (वा) अथवा (धना) गोहिरण्यरूप धन हमको प्रदान करे (येभिः) जिन धनों से हम (अर्वतः) बलवाले शत्रुओं को (जुनीमसि) जीतें, (कस्यचित् मर्तस्य) किसी के मनुष्य का (तिरः) तिरस्कार करके (परिह्वृतिम्) पीड़ा देकर (वयम्) हम लोग (धनानि) धनों को (विश्वधा) सदैव (भरेमहि) धारण न करें ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को परमात्मा से सदैव इस प्रकार के बल की याचना करनी चाहिये कि वह किसी मनुष्य को अन्याय से पीड़ा देकर धन का संग्रह न करे, किन्तु यदि धनसंग्रह की इच्छा हो, तो वह अपने शत्रुओं को पराजय करके धन का लाभ करे ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अकुटिलता-अस्वार्थ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः) = हमें (इन्दवः) = ये सोमकण (प्रधन्वन्तु) = प्रकर्षेण प्राप्त हों। ये हमारे लिये (मदच्युतः) = उल्लास को प्राप्त करानेवाले हों, उल्लास से ये हमें आसेचित कर दें । (येभिः) = जिन सोमों से हम (धना) = सब धनों को (वा) = तथा (अर्वतः) = इन इन्द्रियाश्वों को (जुनीमसि) = प्राप्त हों। ये सोम हमें प्राप्त होकर हमारे जीवन को उल्लासमय बनाएँ। [२] ये सोम (यस्य कस्य चित्) = जिस किसी मनुष्य की (परिहृतिम्) = कुटिलता को (तिरः) = हमारे से तिरोहित करें। हम एक सांसारिक पुरुष की तरह कुटिल मार्ग से धनार्जन करनेवाले न हों । (वयम्) = हम (धनानि) = धनों को (विश्वधा) = सब के धारण के हेतु से (भरेमहि) = पोषित करें। हमारे धन केवल हमारा ही पोषण करनेवाले न हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण द्वारा हम धनों का विजय करें। कुटिलता से दूर रहते हुए, सबके धारण के हेतु से ही धनों का सम्पादन करें। सोम का विनाश मनुष्य को कुटिल व स्वार्थी बना देता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मदच्युतः) आनन्दप्रदः (इन्दवः) प्रकाशस्वरूपः परमात्मा (नः) अस्माकं (प्रधन्वन्तु) प्रागच्छन्तु (वा) अथ वा (धना) धनानि प्रददातु (येभिः) यैर्धनैः (अर्वतः) बलवच्छत्रुः समीपं गत्वा (जुनीमसि) जयामः (कस्यचित् मर्तस्य) कस्यापि मनुष्यस्य (तिरः) तिरस्कारं कृत्वा (परिह्वृतिम्) पीडयित्वा (वयम्) ईश्वरोपासकाः (धनानि) गोहिरण्यरूपाणि (विश्वधा) सर्वदा (भरेमहि) न धारयामः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the bright and blissful Soma streams of divine honey joy inspire us, by which we, warriors of advancement and progress, may win and acquire wealth and, warding off the crookedness of any human power whatever it be, we may always achieve wealth of universal value.