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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: कविः छन्द: जगती स्वर: निषादः

स॒मु॒द्रिया॑ अप्स॒रसो॑ मनी॒षिण॒मासी॑ना अ॒न्तर॒भि सोम॑मक्षरन् । ता ईं॑ हिन्वन्ति ह॒र्म्यस्य॑ स॒क्षणिं॒ याच॑न्ते सु॒म्नं पव॑मान॒मक्षि॑तम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samudriyā apsaraso manīṣiṇam āsīnā antar abhi somam akṣaran | tā īṁ hinvanti harmyasya sakṣaṇiṁ yācante sumnam pavamānam akṣitam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒मु॒द्रियाः॑ । अ॒प्स॒रसः॑ । म॒नी॒षिण॑म् । आसी॑नाः । अ॒न्तः । अ॒भि । सोम॑म् । अ॒क्ष॒र॒न् । ताः । ई॒म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । ह॒र्म्यस्य॑ । स॒क्षणि॑म् । याच॑न्ते । सु॒म्नम् । पव॑मानम् । अक्षि॑तम् ॥ ९.७८.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:78» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:3» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोममभि) परमात्मा के समक्ष (समुद्रिया आसीना अप्सरसः) अन्तरिक्ष की स्थिर शक्तियें (अक्षरन्) क्षरण करती हुई (मनीषिणम्) मनस्वी पुरुष के (अन्तः) अन्तःकरण में उद्बोधन करती हैं। वे शक्तियें (ताः) इसको (हिन्वन्ति) प्रेरणा करती हैं और उक्त परमात्मा से (हर्म्यस्य) सब सोन्दर्यों के साधन तथा (सक्षणिम्) सब आपत्तियों के संहारनेवाले (पवमानम्) सबको पवित्र करनेवाले (अक्षितम्) क्षयरहित पद की (याचन्ते) उपासक लोग याचना करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्युदादि अनन्त शक्तियें अन्तरिक्ष में स्थिर हैं, उनकी याचना न करके लोग अनन्त शक्तिमद् ब्रह्म से अक्षय पद की याचना करते हैं ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समुद्रियाः, अप्सरसः, अन्तः आसीनाः समुद्रयां अप्स॒रसो

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (समुद्रिया) = ज्ञान समुद्र में विचरनेवाले, निरन्तर स्वाध्याय करनेवाले, (अप्सरसः) = कर्मों में विचरनेवाले, यज्ञादि कर्मों में सतत प्रवृत्त, (अन्तः आसीना:) = बाहर भटकने की अपेक्षा अन्दर हृदय में सब चित्तवृत्तियों को आसीन करनेवाले, अन्दर प्रभु का ध्यान करनेवाले लोग (मनीषिणम्) = बुद्धिवाले, बुद्धि को तीव्र बनानेवाले (सोमम्) = सोम को (अभि अक्षरन्) = अपने शरीर में ही क्षरित करते हैं। सोमरक्षण के तीन उपाय हैं- [क] ज्ञान प्राप्ति में लगे रहना, [ख] यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहना, [ग] प्रभु के समीप हृदय में बैठना । सोमरक्षण का लाभ है- 'बुद्धि की तीव्रता' । [२] (ताः) = वे 'समुद्रिय' व 'अप्सरस्' तथा 'अन्तः आसीन' प्रजायें (ईं) = इस (हर्म्यस्य) = इस शरीर प्रासाद के (सक्षणिम्) = [ सच समवाये] साथ समवाय वाले शरीर में सुरक्षित और [सह=मर्षणे] शत्रुओं का पराभव करनेवाले सोम को (हिन्वन्ति) = बढ़ाता है और (पवमानम्) = इस पवित्र करनेवाले सोम से (अक्षितं सुम्नम्) = अक्षीण सुख की (याचन्ते) = याचना करते हैं, सुरक्षित सोम शत्रुओं का विनाश करता है और हमारे जीवन को सुखी करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानरुचि, क्रियाशील, उपासक बनकर सोम का रक्षण करें। यह हमारे शत्रुओं का पराभव करके हमें सुखी करेगा। सब रोगों व वासनाओं का विनाशक यह 'पवमान' है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सोममभि) परमात्मनः समक्षं (समुद्रिया आसीना अप्सरसः) अन्तरिक्षस्य  स्थिरशक्तयः (अक्षरन्) क्षरन्त्यः सत्यः (मनीषिणम्) मनस्विनं पुरुषं (अन्तः) अन्तःकरणे उद्बोधयन्ति। (ताः) शक्तयः (ईम्) अमुं (हिन्वन्ति) प्रेरयन्ति। अथ च उक्तपरमात्मनः सकाशात् (हर्म्यस्य) अखिलसौन्दर्यसाधनभूतं (सक्षणिम्) समस्तापत्तिसंहारकं (पवमानम्) पावकं (अक्षितम्) क्षयरहितं पदमुपासकाः (याचन्ते) प्रार्थयन्ते ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vibrations of divine presence flowing in space and enshrined in the heart radiate to the enlightened soul at peace. They inspire and move this resident companion soul of the beautiful mind and body so that the devotees pray for imperishable peace and bliss of the pure and purifying divinity.