समुद्रियाः, अप्सरसः, अन्तः आसीनाः समुद्रयां अप्स॒रसो
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (समुद्रिया) = ज्ञान समुद्र में विचरनेवाले, निरन्तर स्वाध्याय करनेवाले, (अप्सरसः) = कर्मों में विचरनेवाले, यज्ञादि कर्मों में सतत प्रवृत्त, (अन्तः आसीना:) = बाहर भटकने की अपेक्षा अन्दर हृदय में सब चित्तवृत्तियों को आसीन करनेवाले, अन्दर प्रभु का ध्यान करनेवाले लोग (मनीषिणम्) = बुद्धिवाले, बुद्धि को तीव्र बनानेवाले (सोमम्) = सोम को (अभि अक्षरन्) = अपने शरीर में ही क्षरित करते हैं। सोमरक्षण के तीन उपाय हैं- [क] ज्ञान प्राप्ति में लगे रहना, [ख] यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहना, [ग] प्रभु के समीप हृदय में बैठना । सोमरक्षण का लाभ है- 'बुद्धि की तीव्रता' । [२] (ताः) = वे 'समुद्रिय' व 'अप्सरस्' तथा 'अन्तः आसीन' प्रजायें (ईं) = इस (हर्म्यस्य) = इस शरीर प्रासाद के (सक्षणिम्) = [ सच समवाये] साथ समवाय वाले शरीर में सुरक्षित और [सह=मर्षणे] शत्रुओं का पराभव करनेवाले सोम को (हिन्वन्ति) = बढ़ाता है और (पवमानम्) = इस पवित्र करनेवाले सोम से (अक्षितं सुम्नम्) = अक्षीण सुख की (याचन्ते) = याचना करते हैं, सुरक्षित सोम शत्रुओं का विनाश करता है और हमारे जीवन को सुखी करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानरुचि, क्रियाशील, उपासक बनकर सोम का रक्षण करें। यह हमारे शत्रुओं का पराभव करके हमें सुखी करेगा। सब रोगों व वासनाओं का विनाशक यह 'पवमान' है ।