सोमरक्षण व राक्षसी भावों का विनाश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम-वीर्यशक्ते ! तू नृभिः = उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्यों से इन्द्राय - प्रभु प्राप्ति के लिये परिषिच्यसे शरीर में समन्तात् सिक्त किया जाता है। शरीर में सिक्त हुआ हुआ तू इस शरीर को प्रभु का अधिष्ठान बनाता है। नृचक्षाः सब मनुष्यों का ध्यान करनेवाला तू ऊर्मि:- उत्साह की तरंगों को उत्पन्न करनेवाला है । कविः - तू क्रान्तदर्शी है, सुरक्षित सोम बुद्धि को तीव्र करता है और इस प्रकार यह मनुष्य को प्रत्येक तत्त्व के अन्तर्दृष्टिवाला बनाता है। तू वने - प्रभु के उपासक में अज्यसे=अलंकृत किया जाता है, उपासक के शरीर में सोम सुरक्षित रहता है। [२] ते= तेरी स्स्रुतयः = शरीर में गतियाँ सहस्त्रम्-हजारों प्रकार से पूर्वी :- पालन व पूरण करनेवाली सन्ति होती हैं। ये गतियाँ हि-निश्चय से यातवे - राक्षसों के, राक्षसी भावों के, विनाश के लिये होती हैं [यहाँ 'मशकार्थो धूमः = मशक निवृत्ति के लिये धूवाँ है' ऐसा प्रयोग है] । राक्षसी भावों के विनाश के होने पर अश्वा: - इन्द्रियाश्व हरयः दुःखों का हरण करनेवाले व चमूषदः - शरीररूप चमस में स्थित होनेवाले होते हैं । अर्थात् उस समय इन्द्रियाँ इधर-उधर भटकती नहीं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से प्रभु प्राप्ति होती है, यह हमें तीव्र बुद्धि, स्वस्थ व पवित्र जीवनवाला बनाता है ।