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देवता: पवमानः सोमः ऋषि: कविः छन्द: जगती स्वर: निषादः

ए॒ष प्र कोशे॒ मधु॑माँ अचिक्रद॒दिन्द्र॑स्य॒ वज्रो॒ वपु॑षो॒ वपु॑ष्टरः । अ॒भीमृ॒तस्य॑ सु॒दुघा॑ घृत॒श्चुतो॑ वा॒श्रा अ॑र्षन्ति॒ पय॑सेव धे॒नव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

eṣa pra kośe madhumām̐ acikradad indrasya vajro vapuṣo vapuṣṭaraḥ | abhīm ṛtasya sudughā ghṛtaścuto vāśrā arṣanti payaseva dhenavaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒षः । प्र । कोशे॑ । मधु॑ऽमान् । अ॒चि॒क्र॒द॒त् । इन्द्र॑स्य । वज्रः॑ । वपु॑षः । वपुः॑ऽतरः । अ॒भि । ई॒म् । ऋ॒तस्य॑ । सु॒ऽदुघाः॑ । घृ॒त॒ऽश्चुतः॑ । वा॒श्राः । अ॒र्ष॒न्ति॒ । पय॑साऽइव । धे॒नवः॑ ॥ ९.७७.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:77» मन्त्र:1 | अष्टक:7» अध्याय:3» वर्ग:2» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब वाणियों का सदाचार वर्णन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वाश्राः) शब्द करती हुई (धेनवः) वाणियें जो (पयसेव) जलप्रवाह के समान (अभ्यर्षन्ति) चलती हैं, वे वाणियें (ईम्) इस (ऋतस्य) सत्य की (सुदुघाः) दोहन करनेवाली हैं और (घृतश्चुतः) माधुर्य को देनेवाली हैं। (एषः) उक्त परमेश्वर (कोशे) अन्तःकरण में (मधुमान्) आनन्दस्वरूप से वर्तमान परमात्मा (प्राचिक्रदत्) साक्षीरूप से उपदेश करता है और वह (वपुष्टरः) सबका आदिबीज है तथा (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (वपुषः) शरीर का (वज्रः) वज्र है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सब सच्चाइयों का आश्रय एकमात्र वाणी है। जो पुरुष वाणी को मीठा और सब कामनाओं की दोहन करनेवाली बनाते हैं, वे इस संसार में सदैव सुखलाभ करते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वपुषो वपुष्टरः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एषः) = यह सोम (प्र कोशे) = सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय कोश में (मधुमान्) = अत्यन्त माधुर्यवाला होता हुआ (अचिक्रदत्) = प्रभु का आह्वान करता है । सोमरक्षण के होने पर माधुर्य व आनन्द की वृद्धि होती है तथा प्रभु-स्तवन की वृत्ति उत्पन्न होती है । यह सोम (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष का (वज्रः) = शत्रु-संहारक अस्त्र बनता है । (वपुषः वपुष्टरः) = सर्वोत्तम वप्ता [बोनेवाला] है, यह सोम हमारे जीवन में सब सद्गुणों के बीजों को बोता है। [२] (ईम्) = निश्चय से सोमरक्षण के होने पर (ऋतस्य) = सत्य वेदज्ञान की (वाश्रा:) = वाणियाँ (अभि अर्षन्ति) = हमें आभिमुख्येन प्राप्त होती हैं । ये वाणियाँ (सुदुघाः) = उत्तम ज्ञान का हमारे अन्दर प्रपूरण करनेवाली हैं तथा (घृतश्चुत:) = ज्ञानदीप्ति को व नैर्मल्य को हमारे अन्दर प्रवाहित करनेवाली हैं। ये वाणियाँ हमें इस प्रकार प्राप्त होती हैं, (इव) = जैसे कि (धेनवः) = गौवें (पयसा) = दूध के देने के हेतु से हमें प्राप्त होती हैं। ये गौवें दूध देती हैं, वेदवाणी रूप गौवें ज्ञानदुग्ध को प्राप्त कराती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से [क] जीवन मधुर बनता है, [ख] वृत्ति प्रभु-प्रवण होती है, [ग] शत्रु संहारक शक्ति प्राप्त होती है, [घ] सगुणों के बीज बोये जाते हैं, [ङ] सत्य ज्ञान की वाणियाँ प्राप्त होती हैं।
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आर्यमुनि

अथ वाचां सदाचारो वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (वाश्राः) शबदवत्यः (धेनवः) वाण्यः याः (पयसेव) जलप्रवाह इव (अभ्यर्षन्ति) अभिगच्छन्ति ताः (ईम्) अस्य (ऋतस्य) सत्यस्य (सुदुघाः) दोग्ध्र्यः सन्ति। तथा (घृतश्चुतः) माधुर्यदात्र्यः सन्ति। (एषः) उक्तः परमेश्वरः (कोशे) अन्तःकरणे (मधुमान्) आनन्दस्वरूपेण वर्तमानः सन् (प्राचिक्रदत्) साक्षित्वेनोपदिशति। स (वपुष्टरः) सर्वेषामादिबीजमस्ति। तथा (इन्द्रस्य) कर्मयोगिनः (वपुषः) शरीरस्य (वज्रः) वज्रोऽस्ति ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This soma, blissful spirit of the universe, full of honey sweets of joy, vibrates and reveals itself aloud in the ananda-maya kosha at the heart’s core of the soul, potent as thunderbolt of Indra, beauty, power and bliss incarnate, more beautiful and vigorous than beauty and power itself. All voices of speech replete with the spirit of truth and divinity, generous and overflowing with liquidity of meaning and spirit of divinity and divine law flow from it, about it and to it like milch cows overflowing with milk for the calf.