पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वृषा इव) = जैसे एक बैल (यूथा) = गो-समूहों की ओर जाता है, इसी प्रकार हे सोम ! तू (कोशं परिअर्षसि) = अन्नमय आदि कोशों को प्राप्त होता है। वस्तुतः उन सब कोशों को तू ही उस-उस ऐश्वर्य से परिपूर्ण करता है । (अपां उपस्थे) = कर्मों की उपासना में (वृषभ:) = शक्तिशाली यह सोम (कनिक्रदत्) = प्रभु के स्तोत्रों का खूब ही उच्चारण करता है। अर्थात् सोमरक्षक पुरुष प्रभु- स्मरण के साथ सदा कार्यों में प्रवृत्त रहता है, यह क्रियाशीलता उसकी शक्ति को स्थिर रखती है । [२] हे सोम ! (सः) = वह तू (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये पवसे प्राप्त होता है । (मत्सरिन्तमः) = उसके जीवन में अतिशयेन आनन्द का संचार करता है। हे सोम ! तू हमें प्राप्त हो, (यथा) = जिससे कि हम (त्वा उतयः) = तेरे से रक्षित हुए हुए (जेषाम) = विजयी हों। सोम हमें वह शक्ति प्राप्त कराता है, जिससे कि हम सदा विजयी होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमें सदा संग्रामों में विजय प्राप्त कराता है। सब कोशों को यही परिपूर्ण करता है। प्रभु स्मरण के साथ हमें कर्मशील बनाता है, हमारे में आनन्द का संचार करता है । अगले सूक्त में भी 'कवि' ही सोम का स्तवन करता है-