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ऋ॒तस्य॑ जि॒ह्वा प॑वते॒ मधु॑ प्रि॒यं व॒क्ता पति॑र्धि॒यो अ॒स्या अदा॑भ्यः । दधा॑ति पु॒त्रः पि॒त्रोर॑पी॒च्यं१॒॑ नाम॑ तृ॒तीय॒मधि॑ रोच॒ने दि॒वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtasya jihvā pavate madhu priyaṁ vaktā patir dhiyo asyā adābhyaḥ | dadhāti putraḥ pitror apīcyaṁ nāma tṛtīyam adhi rocane divaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋतस्य॑ । जि॒ह्वा । प॒व॒ते॒ । मधु॑ । प्रि॒यम् । व॒क्ता । पतिः॑ । धि॒यः । अ॒स्याः । अदा॑भ्यः । दधा॑ति । पु॒त्रः । पि॒त्रोः । अ॒पी॒च्य॑म् । नाम॑ । तृ॒तीय॑म् । अधि॑ । रो॒च॒ने । दि॒वः ॥ ९.७५.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:75» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:33» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवः) द्युलोक के (रोचने) प्रकाश के लिये (तृतीयं) तीसरा (नाम) नाम (अधिदधाति) धारण करता है तथा (पुत्रः पित्रोः)  सन्तान-सन्तानी भाव का (अपीच्यम्) अधिकरण है और (ऋतस्य जिह्वा) सच्चाई की जिह्वा है तथा (पवते) सबको पवित्र करता है। (मधु) मधुर (प्रियम्) प्रिय वचनों का (वक्ता) कथन करनेवाला है और (अदाभ्यः) अदम्भनीय वह परमात्मा (अस्या धियः) इन कर्मों का अधिपति है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जीव के शुभाशुभ सब कर्मों का अधिपति परमात्मा है। उसी प्रकाशस्वरूप परमात्मा से सब द्युभ्वादि लोक-लोकान्तरों का प्रकाश होता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सत्यं ब्रूयात्-प्रियं ब्रूयात्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र की 'अधि येषु वर्धते' इस पंक्ति का व्याख्यान करते हुए कहते हैं कि [क] इस सोमी पुरुष को (ऋतस्य जिह्वा पवते) = सत्य की वाणी प्राप्त होती है, यह सदा सत्य ही बोलता है । पर साथ ही, (मधु) = मधुर और (प्रियं वक्ता) = प्रिय बोलता है । (अस्याः धियः पतिः) = प्रभु से दी गयी इस बुद्धि का रक्षण करनेवाला होता है और (अदाभ्यः) = वासनाओं से हिंसित नहीं होता । [२] यह (पुत्रः) = [पुनाति त्रायते] अपने को पवित्र बनानेवाला व अपना रक्षण करनेवाला व्यक्ति (पित्रोः) = द्यावापृथिवी में, मस्तिष्क व शरीर में, (अपीच्यम्) = अन्तर्हित, अर्थात् शरीर व मस्तिष्क में ही ज्ञानाग्नि के ईंधन के रूप में सुरक्षित किये गये, (दिवः अधिरोचनम्) = ज्ञान को खूब ही दीप्त करनेवाले (तृतीयम्) = वसु-रुद्र से भी ऊपर उठकर आदित्य संज्ञक (नाम) = इन रेतः कणों को (दधाति) = धारण करता है । २५ वर्ष तक के ब्रह्मचर्य में ये रेतःकण 'वसु' हैं, हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले हैं । ४४ वर्ष तक के ब्रह्मचर्य में ये 'रुद्र' हो जाते हैं, सब रोगों को दूर भगानेवाले व अमृतत्त्व प्राप्त करानेवाले होते हैं। अब तृतीय ४८ वर्ष तक के ब्रह्मचर्य में ये 'आदित्य' सब गुणों का आदान करनेवाले होते हैं। इन रेतःकणों का रक्षक सर्वगुणों का आदाता बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षक पुरुष 'प्रिय सत्य बोलता है, बुद्धि का रक्षक होता है, वासनाओं से हिंसित नहीं होता, देदीप्यमान ज्योति को प्राप्त करता हुआ सब गुणों का ग्रहण करनेवाला' बनता है ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवः) द्युलोकस्य (रोचने) प्रकाशनाय (तृतीयं नाम) तृतीयं नामधेयम्। (अधिदधाति) धरति। तथा (पुत्रः पित्रोः) सन्तानभावस्य सन्तानीभावस्य च (अपीच्यम्) अधिकरणरूपोऽस्ति। अथ च (ऋतस्य जिह्वा) सत्यस्य जिह्वासि त्वम्। तथा (पवते) सर्वान् पवित्रयति। (मधु) मधुरस्य (प्रियम्) प्रियवचनस्य (वक्ता) कथनकर्तास्ति। तथा (अदाभ्यः) अदम्भनीयः स परमेश्वरः (अस्या धियः) अमीषां कर्मणामधिपतिरस्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The flame of yajna as the voice of eternal truth rises and expresses the dear delicious beauty and glory of Soma, spirit of universal light and bliss. The speaker and protector of the acts of yajna and Soma truth of life is fearless, undaunted. Just as progeny is the continuance and illumination of the honour and reverence of parents, so is yajna the progeny and illuminative soma of Soma refulgent in the third and highest region of the light of existence.