सत्यं ब्रूयात्-प्रियं ब्रूयात्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र की 'अधि येषु वर्धते' इस पंक्ति का व्याख्यान करते हुए कहते हैं कि [क] इस सोमी पुरुष को (ऋतस्य जिह्वा पवते) = सत्य की वाणी प्राप्त होती है, यह सदा सत्य ही बोलता है । पर साथ ही, (मधु) = मधुर और (प्रियं वक्ता) = प्रिय बोलता है । (अस्याः धियः पतिः) = प्रभु से दी गयी इस बुद्धि का रक्षण करनेवाला होता है और (अदाभ्यः) = वासनाओं से हिंसित नहीं होता । [२] यह (पुत्रः) = [पुनाति त्रायते] अपने को पवित्र बनानेवाला व अपना रक्षण करनेवाला व्यक्ति (पित्रोः) = द्यावापृथिवी में, मस्तिष्क व शरीर में, (अपीच्यम्) = अन्तर्हित, अर्थात् शरीर व मस्तिष्क में ही ज्ञानाग्नि के ईंधन के रूप में सुरक्षित किये गये, (दिवः अधिरोचनम्) = ज्ञान को खूब ही दीप्त करनेवाले (तृतीयम्) = वसु-रुद्र से भी ऊपर उठकर आदित्य संज्ञक (नाम) = इन रेतः कणों को (दधाति) = धारण करता है । २५ वर्ष तक के ब्रह्मचर्य में ये रेतःकण 'वसु' हैं, हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले हैं । ४४ वर्ष तक के ब्रह्मचर्य में ये 'रुद्र' हो जाते हैं, सब रोगों को दूर भगानेवाले व अमृतत्त्व प्राप्त करानेवाले होते हैं। अब तृतीय ४८ वर्ष तक के ब्रह्मचर्य में ये 'आदित्य' सब गुणों का आदान करनेवाले होते हैं। इन रेतःकणों का रक्षक सर्वगुणों का आदाता बनता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षक पुरुष 'प्रिय सत्य बोलता है, बुद्धि का रक्षक होता है, वासनाओं से हिंसित नहीं होता, देदीप्यमान ज्योति को प्राप्त करता हुआ सब गुणों का ग्रहण करनेवाला' बनता है ।