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स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒ ता अ॑स॒श्चत॑स्तृ॒तीये॑ सन्तु॒ रज॑सि प्र॒जाव॑तीः । चत॑स्रो॒ नाभो॒ निहि॑ता अ॒वो दि॒वो ह॒विर्भ॑रन्त्य॒मृतं॑ घृत॒श्चुत॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sahasradhāre va tā asaścatas tṛtīye santu rajasi prajāvatīḥ | catasro nābho nihitā avo divo havir bharanty amṛtaṁ ghṛtaścutaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒हस्र॑ऽधारे । अव॑ । ताः । अ॒स॒श्चतः॑ । तृ॒तीये॑ । स॒न्तु॒ । रज॑सि । प्र॒जाऽव॑तीः । चत॑स्रः । नाभः॑ । निऽहि॑ताः । अ॒वः । दि॒वः । ह॒विः । भ॒र॒न्ति॒ । अ॒मृत॑म् । घृ॒त॒ऽश्चुतः॑ ॥ ९.७४.६

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:74» मन्त्र:6 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:32» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:6


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रधारे)  अनन्त प्रकार के ऐश्वर्यवाले (तृतीये) तीसरे अन्तरिक्षलोक में (रजसि) जो रजोगुणविशिष्ट है, उसमें (प्रजावतीः) नाना प्रकार की प्रजावाले ऐश्वर्य (सन्तु) हमको प्राप्त हों। (असश्चतः) जो ऐश्वर्य जीवन को अशक्त करनेवाले न हों, (ताः) वे शक्तियें (घृतः चुतः) जो नाना प्रकार के स्निग्ध पदार्थों की देनेवाली हैं (हविः) और हविरूप अमृत को देनेवाली हैं और जो (दिवः अवः निहिताः) द्युलोक के नीचे रक्खी हुई हैं, जिनमें (चतस्रः नाभः) चार प्रकार की दीप्ति है अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों प्रकार के फल संयुक्त हैं, वे शक्तियें परमात्मा हमें प्रदान करे ॥६॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा जिन पर प्रसन्न होता है, उनको चारों प्रकार के फलों का प्रदान करता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'दिवः हविः भरन्ति अमृतं घृतश्चतः'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सहस्त्रधारे) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाले उस प्रभु में (ताः) = उन रेतः कणों को (अव) = तू रक्षित कर । प्रभु की उपासना के द्वारा तू इनका रक्षण कर । (असश्चतः) = विषयों में आसक्त न होती हुई, अतएव (प्रजावती:) = प्रकृष्ट सन्तानोंवाली प्रजायें तृतीये रजसि सन्तु तृतीय लोक में रहनेवाली हों। यह तृतीय लोक 'स्थूल व सूक्ष्म' शरीरों के बाद 'कारण' शरीर है। यही आनन्दमयकोश है। सोमरक्षक पुरुष इस आनन्दमय लोक में ही निवास करते हैं । [२] इनके जीवन में (चतस्रः) = चारों (नाभः) = ज्ञान के बन्धन (निहिताः) = स्थापित होते हैं, 'ऋग्यजु साम अथर्व' रूप चारों ज्ञानदीप्तियाँ इन्हें प्राप्त होती हैं। (अवः) = [ अवति इति] ये ज्ञानदीप्तियाँ ही इनका रक्षण करनेवाली होती हैं [विच् प्रत्यय में यह रूप बना है]। ये (घृतश्चुत:) = ज्ञानदीप्ति का अपने में क्षरण करनेवाले लोग (दिवः हविः) = ज्ञान की हवि को भरन्ति धारण करते हैं। यह हवि ही (अमृतम्) = इनके लिये अमृत होती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु स्मरण से सोम का रक्षण होता है । सोमरक्षण से ज्ञानवृद्धि होती है ये लोग सदा अनासक्त भाव से कार्य करते हुए सदा आनन्दमयकोश में निवास करते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सहस्रधारे) नानविधैश्वर्यवति (तृतीये) तृतीयेऽन्तरिक्षलोके (रजसि) यो लोको रजोगुणविशिष्टोऽस्ति तस्मिन् (प्रजावतीः) नानाविधप्रजावन्त्यैश्वर्याणि (सन्तु) अस्मान् मिलन्तु। (असश्चतः) यान्यैश्वर्याणि जीवात्मनोऽशक्तकारीणि न भवन्ति (ताः) ताश्शक्तयः (घृतः चुतः) या नानाविधस्निग्धपदार्थदात्र्यः (हविः) हवीरूपं (अमृतं भरन्ति) अमृतं ददति। अथ च याः (दिवः अवः निहिताः) द्युलोकस्याधः स्थितास्तथा यासु (चतस्रः नाभः) चतुर्विधा दीप्तयः सन्ति, धर्मार्थकाममोक्षफलयुता इति यावत् ताश्शक्तीः परमात्मास्मभ्यं ददातु ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Those creative vitalities in the sun of a thousand streams of light and life be there above in the third region of light in space and come down to earth. Four treasure casks of Dharma, artha, kama and moksha abide well guarded in the region of light and, overflowing with ghrta, living water and divine sanctity, bring down the spirit and message of full life on earth for the joy of human life, imperishable and immortal.