ऊर्मिणा सचमानः सोमः अराबीत्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अंशुः) = प्रकाश को प्राप्त करानेवाला यह सोम (ऊर्मिणा) = [ light] ज्ञान के प्रकाश से (सचमानः) = समवेत हुआ हुआ अरावीत् प्रभु के नामों का उच्चारण करता है, स्तवन करता है । सोमरक्षण से जहां ज्ञान बढ़ता है, वहां प्रभु-स्तवन की वृत्ति उत्पन्न होती है। यह सोम (मनुषे) = विचारशील पुरुष के लिये (देवाव्यम्) = दिव्यगुणों के रक्षण में उत्तम (त्वचम्) = त्वचा को, रक्षक आवरण को (पिन्वति) = बढ़ाता है । सोमरक्षण से शरीर को वह कवच तुल्य त्वचा प्राप्त होती है जो उसे रोग आदि से आक्रान्त नहीं होने देती। [२] यह सोमरक्षक पुरुष (अदितेः) = अदीना देवमाता की (उपस्थे) = गोद में रहता हुआ, अदीन व दिव्यगुणोंवाला बनता हुआ, (गर्भं दधाति) = सबके अन्दर निवास करनेवाले, सबके वर्णरूप उस प्रभु को (दधाति) = धारण करता है। येन जिस प्रभु के धारण से (तोकं च) = पुत्रों को (च) = व (तनयं च) = पौत्रों को भी (आधामहे) = हम धारण करनेवाले बनते हैं । प्रभु का स्मरण हमारे सन्तानों को भी उत्तम बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हम [क] प्रभु-स्तवन की वृत्तिवाले बनते हैं, [ख] हमारा ज्ञान बढ़ता है, [ग] हमारी त्वचा कवच का रूप धारण करती है, [घ] हमारे सन्तान भी उत्तम होते हैं ।