वांछित मन्त्र चुनें

आ॒त्म॒न्वन्नभो॑ दुह्यते घृ॒तं पय॑ ऋ॒तस्य॒ नाभि॑र॒मृतं॒ वि जा॑यते । स॒मी॒ची॒नाः सु॒दान॑वः प्रीणन्ति॒ तं नरो॑ हि॒तमव॑ मेहन्ति॒ पेर॑वः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ātmanvan nabho duhyate ghṛtam paya ṛtasya nābhir amṛtaṁ vi jāyate | samīcīnāḥ sudānavaḥ prīṇanti taṁ naro hitam ava mehanti peravaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ॒त्म॒न्ऽवत् । नभः॑ । दु॒ह्य॒ते॒ । घृ॒तम् । पयः॑ । ऋ॒तस्य॑ । नाभिः॑ । अ॒मृत॑म् । वि । जा॒य॒ते॒ । स॒मी॒ची॒नाः । सु॒ऽदान॑वः । प्री॒ण॒न्ति॒ । तम् । नरः॑ । हि॒तम् । अव॑ । मे॒ह॒न्ति॒ । पेर॑वः ॥ ९.७४.४

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:74» मन्त्र:4 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:31» मन्त्र:4 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:4


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जिस परमात्मा से (नभः) द्युमण्डल से (आत्मन्वत्) सारभूत (घृतम्) जलादिक (दुह्यते) दुहे जाते हैं और (ऋतस्य) जो सच्चाई की (नाभिः) नाभि है और (अमृतम्) अमृतस्वरूप है, वह (पयः) तृप्तिरूप परमात्मा (विजायते) सर्वत्र विराजमान है। (नरः) जो पुरुष उसकी उपासना करता है, (ते) उसको (पेरवः) सर्वरक्षक शक्तियें (प्रीणन्ति) तृप्त करती हैं और (समीचीनाः) सुन्दर (सुदानवः) दानशील शक्तियें उसके लिये (हितम्) हित की (अव मेहन्ति) वृष्टि करती हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करते हैं, परमात्मा उनके लिये अपनी दानशील शक्तियों से अनन्त प्रकार के ऐश्वर्यों की वृष्टि करता है ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'ऋतस्य नाभिः, अमृतं ' [सोम]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'नभस्' शब्द जल [water] का वाचक होता हुआ यहाँ रेतःकणों [सोम] का वाचक है 'आप: रेतो भूत्वा ० ' । (आत्मन्वत् नभः) = यह आत्मज्ञान के प्रकाशवाला सोम [आत्मज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करानेवाला सोम] (घृतम्) = ज्ञानदीप्ति को तथा (पयः) = [ क्षत्रं वै पयः श० १२ । ७।३।८] शक्ति को (दुह्यते) = दोहा जाता है। अर्थात् सोम से ज्ञानदीप्ति व शक्ति प्राप्त होती है। यह सोम (ऋतस्य नाभिः) = ऋत का बन्धन करनेवाला है। हमारे जीवनों में सोम ही ऋत का स्थापन करता है। यह सोम (अमृतं विजायते) = हमारे लिये अमृत हो जाता है । [२] (समीचीनाः) = मिलकर सम्यक् गतिवाले (सुदानवः) = सम्यक् वासनाओं का दान [सवन, दाप् लवने], छेदन करनेवाले, वासनाओं को काटनेवाले (नरः) = व्यक्ति ही (तम्) = उस प्रभु की प्रीणन्ति प्रीणित करते हैं । प्रभु इन (समीचीन सुदानु) = पुरुषों से ही प्रसन्न होते हैं । ये (पेरवः) = अपना पालन व पूरण करनेवाले लोग (हितम्) = प्रभु द्वारा शरीर में स्थापित इस सोम को (अव) = वासनाओं से दूर होकर (मेहन्ति) = इस शरीर रूप पृथिवी में ही सिक्त करते हैं। सोम कणों का यह शरीर में सेचन ही वस्तुतः उन्हें 'पेरु' = अपना पालन व पूरण करनेवाला बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम ही हमारे जीवनों में ऋत का स्थापन करता है और हमारी अमरता [नीरोगता] का कारण बनता है, सो पेरु लोग सोम को शरीर में ही सिक्त करते हैं।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - येन परमात्मना (नभः) आकाशमण्डलात् (आत्मन्वत्) सारभूतं (घृतम्) जलादिकं (दुह्यते) प्रपूर्यते अथ च (ऋतस्य नाभिः) सत्यस्य नाभिस्थानीयोऽस्ति तथा (अमृतम्) अमृतस्वरूपोऽस्ति सः (पयः) तृप्तिरूपः परमात्मा (विजायते) विराजमानो वर्तते। (नरः) यः पुरुषः तस्योपासनां करोति (तम्) तं पुरुषं (पेरवः) सर्वरक्षिकाः शक्तयः (प्रीणन्ति) तर्पयन्ति। अथ च (समीचीनाः) सुन्दराः (सुदानवः) दानशीलाश्शक्तयः तदर्थं (हितम्) हितस्य (अव मेहन्ति) वृष्टिं कुर्वन्ति ॥४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Living energising showers of soma ghrta and waters are received from space. The centre-hold of eternal truth and spirit of immortality here constantly manifests in the flow of existence. Joint integrated generous powers of nature serve that divinity and leading lights of humanity too offer service in abundance to the munificent power.