'ऋतस्य नाभिः, अमृतं ' [सोम]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'नभस्' शब्द जल [water] का वाचक होता हुआ यहाँ रेतःकणों [सोम] का वाचक है 'आप: रेतो भूत्वा ० ' । (आत्मन्वत् नभः) = यह आत्मज्ञान के प्रकाशवाला सोम [आत्मज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करानेवाला सोम] (घृतम्) = ज्ञानदीप्ति को तथा (पयः) = [ क्षत्रं वै पयः श० १२ । ७।३।८] शक्ति को (दुह्यते) = दोहा जाता है। अर्थात् सोम से ज्ञानदीप्ति व शक्ति प्राप्त होती है। यह सोम (ऋतस्य नाभिः) = ऋत का बन्धन करनेवाला है। हमारे जीवनों में सोम ही ऋत का स्थापन करता है। यह सोम (अमृतं विजायते) = हमारे लिये अमृत हो जाता है । [२] (समीचीनाः) = मिलकर सम्यक् गतिवाले (सुदानवः) = सम्यक् वासनाओं का दान [सवन, दाप् लवने], छेदन करनेवाले, वासनाओं को काटनेवाले (नरः) = व्यक्ति ही (तम्) = उस प्रभु की प्रीणन्ति प्रीणित करते हैं । प्रभु इन (समीचीन सुदानु) = पुरुषों से ही प्रसन्न होते हैं । ये (पेरवः) = अपना पालन व पूरण करनेवाले लोग (हितम्) = प्रभु द्वारा शरीर में स्थापित इस सोम को (अव) = वासनाओं से दूर होकर (मेहन्ति) = इस शरीर रूप पृथिवी में ही सिक्त करते हैं। सोम कणों का यह शरीर में सेचन ही वस्तुतः उन्हें 'पेरु' = अपना पालन व पूरण करनेवाला बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम ही हमारे जीवनों में ऋत का स्थापन करता है और हमारी अमरता [नीरोगता] का कारण बनता है, सो पेरु लोग सोम को शरीर में ही सिक्त करते हैं।