पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋतं यते) = ऋत, अर्थात् सत्य व यज्ञ की ओर जानेवाले के लिये (सुकृतम्) = बड़ी अच्छी प्रकार उत्पन्न किया हुआ (सोम्यं) = मधु-यह सोम सम्बन्धी सारभूत पदार्थ (महि प्सरः) = महान् भक्षणीय पदार्थ होती है । सोम का भक्षण, अर्थात् सोम का अपने अन्दर रक्षण ही मनुष्य को ऋत का पालन करने के योग्य बनाता है। इस सोमरक्षण से (अदितेः) = [अ-दिति-खण्डन] स्वास्थ्य का (ऊर्वी गव्यूतिः) = विशाल मार्ग होता है। अर्थात् सोमरक्षण से हम स्वस्थ व दीर्घजीवन को प्राप्त करते हैं । [२] यह सोम वह वस्तु है (यः) = जो (वृष्टेः ईशे) = धर्ममेघ समाधि में आनन्द की वर्षा को प्राप्त करानेवाली है । इतः इधर जीवन में (उस्त्रियः) = [उस्र = a ray of light] यह प्रकाश की रश्मियोंवाला है। वृषा शरीर में शक्ति का संचार करनेवाला है । (अपां) = नेता-कर्मों का यह सोम प्रणयन करनेवाला है । (यः) = जो सोम (इतः) = इस लोक से हमारा (ऊतिः) = रक्षण करनेवाला है वह (ऋग्मियः) = स्तोतव्य है। शरीर में रोगों से बचाता हुआ, मन में वासनाओं से बचाता हुआ तथा मस्तिष्क में मन्दता [Dullness] से बचाता हुआ यह सोम स्तुति के योग्य क्यों न हो ?
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम ही ऋत के अनुयायी के लिये महान् भोजन है, सोम [वीर्य] ही सर्वोत्तम रक्षणीय वस्तु है । यह सोम स्वस्थ दीर्घजीवन को देता है, धर्ममेघ समाधि में यही आनन्द की वृष्टि का कारण होता है। प्रकाश व शक्ति का यही मूल है।