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दि॒वो यः स्क॒म्भो ध॒रुण॒: स्वा॑तत॒ आपू॑र्णो अं॒शुः प॒र्येति॑ वि॒श्वत॑: । सेमे म॒ही रोद॑सी यक्षदा॒वृता॑ समीची॒ने दा॑धार॒ समिष॑: क॒विः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

divo yaḥ skambho dharuṇaḥ svātata āpūrṇo aṁśuḥ paryeti viśvataḥ | seme mahī rodasī yakṣad āvṛtā samīcīne dādhāra sam iṣaḥ kaviḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दि॒वः । यः । स्क॒म्भः । ध॒रुणः॑ । सुऽआ॑ततः । आऽपू॑र्णः । अं॒शुः । प॒रि॒ऽ एति॑ । वि॒श्वतः॑ । सः । इ॒मे इति॑ । म॒ही इति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । य॒क्ष॒त् । आ॒ऽवृता॑ । स॒मी॒ची॒ने इति॑ स॒म्ऽई॒ची॒ने । दा॒हा॒र॒ । सम् । इषः॑ । क॒विः ॥ ९.७४.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:74» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:31» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवः यः स्कम्भः) जो द्युलोक का सहारा है और (धरुणः) पृथिवी का धारण करनेवाला है तथा (स्वाततः) विस्तृत (आपूर्णः) सर्वत्र परिपूर्ण (अंशुः) व्यापक परमात्मा (विश्वतः) सब ओर से (पर्येति) प्राप्त है, (सः) वह परमात्मा (इमे मही रोदसी) इस भूलोक और अन्तरिक्षलोक को (आवृता) अद्भुत कर्म से (यक्षत्) संगत करता है और (समीचीने) संगत द्युलोक और भूलोक को वही परमात्मा (दाधार) धारण करता है। वह (कविः) सर्वज्ञ परमेश्वर (इषः) ऐश्वर्यों को (सम्) देता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा ने द्युलोक और पृथिवीलोकादिकों को लीलामात्र से धारण किया है, वही सब ऐश्वर्यों का दाता है, अन्य नहीं ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'दिवः स्कम्भः- धरुणः ' अंशुः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दिवः) = ज्ञान-प्रकाश का (यः) = जो (स्कम्भः) = धारण करनेवाला, (धरुणः) = शरीर की सब शक्तियों का आधार (स्वाततः) = [सु आ ततः] सम्यक्तया शरीर में चारों ओर व्याप्त है। (आपूर्णः) = सब दृष्टिकोणों से पूर्ण अंशुः = यह सोम विश्वतः पर्येति-शरीर के अंग-प्रत्यंग में गतिवाला होता है । [२] (सः) = वह यह सोम (इमे) = इन मही (रोदसी) = महत्त्वपूर्ण द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (यक्षत्) = परस्पर संगत करता है, अर्थात् शरीर व मस्तिष्क दोनों को ही उन्नत करता है । (आवृता) = अपने-अपने कार्य में आवर्तनवाले समीचीने मिलकर चलनेवाले इन मस्तिष्क व शरीर को यह (दाधार) = धारण करता है। यह (कविः) = हमें क्रान्तप्रज्ञ, तत्त्वद्रष्टा बनानेवाला सोम हमारे जीवन में (इषः) = प्रेरणाओं को (सं) [दाधार] = धारण करता है । अर्थात् हमें पवित्र हृदयबनाकर प्रभु- प्रेरणाओं को सुनने के योग्य बनाता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर को संगत करता हुआ उन्नत करता है, दोनों को ही उन्नत बनाता है। इन दोनों द्यावापृथिवी को ठीक करके यह हृदयान्तरिक्ष में प्रभु प्रेरणाओं को प्राप्त कराता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवः यः स्कम्भः) यो द्युलोकस्य सहायः अथ च (धरुणः) पृथिव्या धारकोऽस्ति तथा (स्वाततः) विततः (आपूर्णः) सर्वत्र परिपूर्णः (अंशुः) व्यापकः परमात्मा (विश्वतः) सर्वतः (पर्येति) प्राप्तोऽस्ति (सः) असौ परमात्मा (इमे मही रोदसी) इमं भूलोकं द्युलोकं च (आवृता) आश्चर्यकर्मणा (यक्षत्) सङ्गतं करोति। अथ च (समीचीने) सङ्गते द्यावाभूमी स परमात्मैव (दाधार) धारयति। सः (कविः) सर्वज्ञो जगदीश्वरः (इषः) ऐश्वर्यान् (सम्) सम्प्रयच्छति। उपसर्गश्रुतेर्योग्यक्रियाध्याहारः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We pray to that centre-hold of heaven, foundation of existence, boundless holy presence all pervasive and perfect, covering all space all round who holds both these worlds of earth and heaven with the middle regions together and sustains them like a yajamana. He is the omniscient visionary, poetic creator and giver of food and energy for sustenance and knowledge for enlightenment.