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स॒हस्र॑धारे॒ वित॑ते प॒वित्र॒ आ वाचं॑ पुनन्ति क॒वयो॑ मनी॒षिण॑: । रु॒द्रास॑ एषामिषि॒रासो॑ अ॒द्रुह॒: स्पश॒: स्वञ्च॑: सु॒दृशो॑ नृ॒चक्ष॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sahasradhāre vitate pavitra ā vācam punanti kavayo manīṣiṇaḥ | rudrāsa eṣām iṣirāso adruhaḥ spaśaḥ svañcaḥ sudṛśo nṛcakṣasaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स॒हस्र॑ऽधारे । विऽत॑ते । प॒वित्रे॑ । आ । वाच॑म् । पु॒न॒न्ति॒ । क॒वयः॑ । म॒नी॒षिणः॑ । रु॒द्रासः॑ । ए॒षा॒म् । इ॒षि॒रासः॑ । अ॒द्रुहः॑ । स्पशः॑ । सु॒ऽअञ्चः॑ । सु॒ऽदृशः॑ । नृ॒ऽचक्ष॑सः ॥ ९.७३.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:73» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:30» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षसः) कर्मयोगी और (सुदृशः) ज्ञानयोगी (स्वञ्चः) गतिशील और (स्पशः) बुद्धिमान् (अद्रुहः) किसी के साथ द्रोह न करनेवाले हैं तथा (इषिरासः) गमनशील (रुद्रासः) परमात्मा के न्याय पालन करने के लिये रूद्ररूप होते हैं (एषां) उक्तगुणसम्पन्न पुरुषों का परमात्मा सदैव रक्षक होता है और वे लोग (सहस्रधारे वितते) अनन्त आनन्दमय विस्तृत (पवित्रे) पवित्र परमात्मा में (वाचम् आ पुनन्ति) अपनी वाणी को उसकी स्तुति द्वारा पवित्र करते हैं। उक्त प्रकार के विद्वान् ही (मनीषिणः) मनस्वी और (कवयः) क्रान्तदर्शी होते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो लोग परमात्मा के स्वरूप में चितवृत्ति को लगाकर अपने आपको पवित्र करते हैं, वे ही कर्मयोगी और ज्ञानयोगी बन सकते हैं, अन्य नहीं  ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अद्रुहः - सुदृशः - नृचक्षसः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सहस्त्रधारे) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाले वितते सर्वत्र विस्तृत, सर्वव्यापक, (पवित्रे) = पवित्र प्रभु में वाचम् अपनी वाणी को (आपुनन्ति) = सर्वथा पवित्र करते हैं। प्रभु की उपासना के द्वारा वाणी की पवित्रता होती ही है। ये (कवयः) = क्रान्तद्रष्टा- तत्त्वज्ञानी, (मनीषिणः) = मन पर शासन करनेवाली बुद्धिवाले होते हैं। वाणी की पवित्रता इन्हें कवि व मनीषी बनाती हैं । [२] (एषाम्) = इन कवियों व मनीषियों के (रुद्रासः) = प्राण [प्राणा वै रुद्राः जै० ८।२।७] (इषिरासः) = खूब गतिशील होते हैं, अर्थात् इन्हें प्राणशक्ति गतिमय बनाती है। (अद्रुहः) = ये अपनी गतियों के द्वारा किसी का द्रोह नहीं करते । (स्पशः) = प्राणसाधना द्वारा ये प्रभु-दर्शन में प्रवृत्त होते हैं, प्रभु के देखनेवाले होते हैं। (स्वञ्चः) = उत्तम कर्मों द्वारा प्रभु का पूजन करनेवाले होते हैं । (सुदृश) = उत्तम दृष्टिकोणवाले होते हैं। (नृचक्षसः) = मनुष्यों का ध्यान करनेवाले होते हैं, ये केवल अपने लिये नहीं जीते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु में अपने को पवित्र करनेवाले लोग खूब गतिमय, द्रोहशून्य, उत्तम दृष्टिकोणवाले व सबका ध्यान करनेवाले होते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नृचक्षसः) कर्मयोगी तथा (सुदृशः) ज्ञानयोगी (स्वञ्चः) गतिशीलस्तथा (स्पशः) मेधावान् (अद्रुहः) अद्रोग्धा (इषिरासः) गमनशीलः (रुद्रासः) परमात्मनो न्यायपालनाय रुद्ररूपो भवति। (एषाम्) ज्ञानयोगिकर्मयोगिनां सदैव परमात्मा रक्षको भवति। अथ च ते (सहस्रधारे वितते) अत्यन्तानन्दमये विस्तृते (पवित्रे) पूते परमात्मनि (वाचम् आ पुनन्ति) स्वीयवाचं तस्योपासनया पवित्रयन्ति। पूर्वोक्ता विद्वांस एव (मनीषिणः) मनस्विनस्तथा (कवयः) क्रान्तदर्शिनो भवन्ति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In this expansive world of a thousand streams of purity flowing on and on, men of noble thought and poetic vision create, speak and sanctify their word. Men of judgement and rectitude, they discriminate between right and wrong and the natural consequences thereof. They are dynamic, free from jealousy, penetrative observers, worthy of reverence, holy visionaries and constant watchers of humanity