अद्रुहः - सुदृशः - नृचक्षसः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सहस्त्रधारे) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाले वितते सर्वत्र विस्तृत, सर्वव्यापक, (पवित्रे) = पवित्र प्रभु में वाचम् अपनी वाणी को (आपुनन्ति) = सर्वथा पवित्र करते हैं। प्रभु की उपासना के द्वारा वाणी की पवित्रता होती ही है। ये (कवयः) = क्रान्तद्रष्टा- तत्त्वज्ञानी, (मनीषिणः) = मन पर शासन करनेवाली बुद्धिवाले होते हैं। वाणी की पवित्रता इन्हें कवि व मनीषी बनाती हैं । [२] (एषाम्) = इन कवियों व मनीषियों के (रुद्रासः) = प्राण [प्राणा वै रुद्राः जै० ८।२।७] (इषिरासः) = खूब गतिशील होते हैं, अर्थात् इन्हें प्राणशक्ति गतिमय बनाती है। (अद्रुहः) = ये अपनी गतियों के द्वारा किसी का द्रोह नहीं करते । (स्पशः) = प्राणसाधना द्वारा ये प्रभु-दर्शन में प्रवृत्त होते हैं, प्रभु के देखनेवाले होते हैं। (स्वञ्चः) = उत्तम कर्मों द्वारा प्रभु का पूजन करनेवाले होते हैं । (सुदृश) = उत्तम दृष्टिकोणवाले होते हैं। (नृचक्षसः) = मनुष्यों का ध्यान करनेवाले होते हैं, ये केवल अपने लिये नहीं जीते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु में अपने को पवित्र करनेवाले लोग खूब गतिमय, द्रोहशून्य, उत्तम दृष्टिकोणवाले व सबका ध्यान करनेवाले होते हैं ।