वांछित मन्त्र चुनें

पि॒तुर्मा॒तुरध्या ये स॒मस्व॑रन्नृ॒चा शोच॑न्तः सं॒दह॑न्तो अव्र॒तान् । इन्द्र॑द्विष्टा॒मप॑ धमन्ति मा॒यया॒ त्वच॒मसि॑क्नीं॒ भूम॑नो दि॒वस्परि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pitur mātur adhy ā ye samasvarann ṛcā śocantaḥ saṁdahanto avratān | indradviṣṭām apa dhamanti māyayā tvacam asiknīm bhūmano divas pari ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

पि॒तुः मा॒तुः । अधि॑ । आ । ये । स॒म्ऽअस्व॑रन् । ऋ॒चा । शोच॑न्तः । स॒म्ऽदह॑न्तः । अ॒व्र॒तान् । इन्द्र॑ऽद्विष्टाम् । अप॑ । ध॒म॒न्ति॒ । मा॒यया॑ । त्वच॑म् । असि॑क्नीम् । भूम॑नः । दि॒वः । परि॑ ॥ ९.७३.५

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:73» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:29» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:5


0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जो लोग (पितुः मातुः) पिता-माता की शिक्षा को पाकर सुशिक्षित हैं और (ये) जो लोग (ऋचा) वेद की ऋचाओं के द्वारा (समस्वरन्) अपनी जीवनयात्रा करते हैं (शोचन्तोऽव्रतान्) तथा शोकशील अव्रतियों को (सन्दहन्तः) भली-भाँति दाह करनेवाले हैं और जो (मायया) अपनी अपूर्व शक्ति से (इन्द्रद्विष्टाम् अप धमन्ति) ईश्वराज्ञा को भङ्ग करनेवाले राक्षसों का नाश करते हैं और जो राक्षस (असिक्नीम्) रात्रि के अन्धकार के समान (भूमनः) भूलोक और (दिवः) द्युलोक के (परि) चारों ओर (त्वचम्) त्वचा के समान वर्तमान हैं, उनको नाश करनेवाले पितृमान् और मातृमान् कहलाते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य इस संसार में चार प्रकार से शिक्षा को प्राप्त करता है। वे चार प्रकार ये हैं कि माता, पिता, आचार्य और गुरु। इसी अभिप्राय से उपनिषत् में कहा है कि “मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद” ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'पिता माता' का उपासन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु पिता है और वेद [ज्ञान] माता है 'स्तुता मया वरदा वेदमाता'। ये जो लोग (पितुः) = सब के पिता प्रभु का तथा (मातुः) = जीवन के निर्माण करनेवाली वेदमाता का (अधि आ समस्वरन्) = आधिक्येन स्तवन करते हैं, प्रभु की उपासना व वेद के अध्ययन को करते हैं, वे (ऋचा) = इन ज्ञान की वाणियों से [ऋग्वेद - विज्ञान वेद ] (शोचन्तः) = दीप्त होते हुए और (अव्रतान्) = न करने योग्य कार्यों को (सन्दहन्तः) = भस्म करते हुए होते हैं। इन पिता माता के उपासकों का जीवन ज्ञान से दीप्त होता है और अपकर्मों से रहित होता है। [२] ये लोग मायया कर्म व प्रज्ञान के द्वारा (भूमनः) = इस पृथिवी से (दिवस्परि) = और द्युलोक से अर्थात् शरीर व मस्तिष्क से (असिक्नीम्) = काली (त्वचम्) = त्वचा को आवरण को, (अपधमन्ति) = दूर कर देते हैं। शरीर व मस्तिष्क के विकारों को दूर करना ही इनकी काली त्वचा को दूर करना है। यह काली त्वचा 'इन्द्र द्विष्टाम् ' प्रभु के लिये प्रीतिकर नहीं । अर्थात् विकृत शरीर व विकृत मस्तिष्कवाला व्यक्ति कभी प्रभु का प्रिय नहीं हो सकता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु व वेदवाणी के उपासक बनें। ज्ञान से दीप्त व अपकर्मों के दूर करनेवाले हों । शरीर व मस्तिष्क को उज्ज्वल बनायें ।
0 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - ये मनुष्याः (पितुः मातुः) मातापित्रोः शिक्षां प्राप्य सुशिक्षिताः सन्ति अथ (ये) ये जनाः (ऋचा) वेदस्य ऋग्भिः (समस्वरन्) स्वीयजीवनयात्रां कुर्वन्ति तथा (शोचन्तोऽव्रतान्) शोकशीलानव्रतिनः (सन्दहन्तः) सम्यग्दाहकास्सन्ति तथा ये (मायया) स्वकीयापूर्वशक्त्या (इन्द्रद्विष्टाम् अप धमन्ति) ईश्वराज्ञाभञ्जकानां राक्षसानां निहन्तारस्सन्ति अथ च ये राक्षसाः (असिक्नीम्) रात्रेरन्धकारमिव (भूमनः) भूलोकस्य तथा (दिवः) द्युलोकस्य (परि) सर्वतः (त्वचम्) त्वगिव वर्तमानास्तेषां नाशकाः पितृमन्तो मातृमन्तश्च कथ्यन्ते ॥५॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like the rays of sunlight radiating from above to mother earth in unison, shining with their brilliance, illuminating and purifying, and burning off those pollutants which act against natural law, the soma souls of humanity acting in unison around father and mother in holy tradition, shining and sanctifying life with divine hymns, reducing and eliminating powers of negative character and habit against natural law and human values, they drive off and eliminate the defilers and violators of cosmic law, and, with the knowledge and power of the light of great heaven, they remove the veil of the darkness of ignorance.