पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सहस्त्रधारे) = हजारों प्रकार से धारण करनेवाले उस प्रभु में (दिवः नाके) = प्रकाश के सुखमय लोक में स्थित हुए हुए (ते) = वे सोमरक्षक पुरुष (अव समस्वरन्) = संसार के विषयों से दूर होकर प्रभु का गुणगान करते हैं। 'सदा प्रभु में स्थित होना तथा स्वाध्याय द्वारा प्रकाशमय लोक में स्थित होने का प्रयत्न करना' ही विषयों से बचने का तरीका है। ये लोग व्यवहार में भी (मधुजिह्वाः) = मधुरवाणीवाले होते हैं कभी कड़वे शब्द नहीं बोलते और (असश्चतः) = कहीं आसक्त नहीं होते । अनासक्त भाव से अपने कर्त्तव्य कर्मों को करते चलते हैं । [२] ये व्यक्ति (अस्य स्पशः) = इस प्रभु के देखनेवाले होते हैं [ स्पश् To perceive clearly] (न निमिषन्ति) = कभी पलक नहीं मारते, अर्थात् सो नहीं जाते, अप्रमत्त रहते हैं । (भूर्णयः) = सदा पालनात्मक कर्मों में प्रवृत्त रहते हैं। (पदे पदे) = कदम-कदम पर (पाशिनः) = काम-क्रोध आदि पशुओं को पाश में बाँधनेवाले, (सेतवः सन्ति) = लोगों को भवसागर से पार करने के लिये पुल के समान होते हैं। स्वयं काम- क्रोध को जीतते हैं तथा औरों को ज्ञानोपदेश देकर भवसागर से पार करने में सहायक होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-प्रभु-भक्त सदा उपासना व स्वाध्याय में प्रवृत्त होता है । मधुरवाणीवाला, अनासक्त,प्रभु का देखनेवाला, अप्रमत्त व धारणात्मक कर्मों में लगा हुआ होता है। काम-क्रोध को वश में करनेवाला व औरों को ज्ञान देकर तरानेवाला होता है ।