पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह सोम (पृथिव्याः नाभा) = इस शरीर रूप पृथिवी के केन्द्र में होता हुआ, अर्थात् शरीर की सारी शक्तियों का जन्म देनेवाला होता हुआ (महः दिवः धरुणः) = महान् द्युलोक का, मस्तिष्क का (धरुणः) = धारण करनेवाला है । सोम शरीर को सशक्त बनाता है, मस्तिष्क का धारण करता है । (अपां ऊर्मी) = कर्मों की तरंगों में तथा (सिन्धुषु अन्तः) = ज्ञान - समुद्रों में (उक्षितः) = यह सिक्त होता है। अर्थात् निरन्तर कर्मों में लगे रहना तथा ज्ञान-समुद्र में स्नान करना [ स्वाध्याय में तत्पर रहना] सोमरक्षण का साधन बनता है। [२] शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम (इन्द्रस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष का (वज्रः) = वज्र होता है। इसी के रक्षण से यह सभी रोगादि शत्रुओं का संहार कर पाता है । (वृषभ:) = यह हमें शक्तिशाली बनानेवाला है । (विभूवसुः) = यह सोम ही इन्द्र का व्यापक धन है । यह (सोमः) = सोम (चारु) = बड़ी सुन्दरता से हृदे हृदय के लिये (मत्सरः) = आनन्द का संचार करता हुआ (पवते) = प्राप्त होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम शरीर का केन्द्र में स्थित हुआ हुआ मस्तिष्क का धारण करनेवाला है । क्रियाशीलता व ज्ञानपरता के द्वारा शरीर में सुरक्षित होता है । यही हमारा शत्रु संहारक वज्र है, शक्ति को देनेवाला तथा व्यापक धन है। हृदय में सोम ही उल्लास को पैदा करता है।