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नाभा॑ पृथि॒व्या ध॒रुणो॑ म॒हो दि॒वो॒३॒॑ऽपामू॒र्मौ सिन्धु॑ष्व॒न्तरु॑क्षि॒तः । इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ वृष॒भो वि॒भूव॑सु॒: सोमो॑ हृ॒दे प॑वते॒ चारु॑ मत्स॒रः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nābhā pṛthivyā dharuṇo maho divo pām ūrmau sindhuṣv antar ukṣitaḥ | indrasya vajro vṛṣabho vibhūvasuḥ somo hṛde pavate cāru matsaraḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नाभा॑ । पृ॒थि॒व्याः । ध॒रुणः॑ । म॒हः । दि॒वः । अ॒पाम् । ऊ॒र्मौ । सिन्धु॑षु । अ॒न्तः । उ॒क्षि॒तः । इन्द्र॑स्य । वज्रः॑ । वृ॒ष॒भः । वि॒भुऽव॑सुः । सोमः॑ । हृ॒दे । प॒व॒ते॒ । चारु॑ । म॒त्स॒रः ॥ ९.७२.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:72» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य वज्रः) रुद्ररूप परमात्मा (वृषभः) सब कामनाओं की वृष्टि करनेवाला तथा (विभूवसुः) परिपूर्ण एश्वर्यवाला और (चारु मत्सरः) जिसका सर्वोपरि आनन्द है, वह उक्त (सोमः) परमात्मा (हृदे) हमारे हृदय को (पवते) पवित्र करे। (पृथिव्या नाभा) जो परमात्मा पृथिवी की नाभि में स्थिर है और (महो दिवः) बड़े द्युलोक का (धरुणः) धारण करनेवाला है तथा (अपाम् ऊर्मौ) जल की लहरों में और (सिन्धुषु) समुद्रों में (अन्तः उक्षितः) अभिषिक्त किया गया है। उक्त गुणविशिष्ट परमात्मा हमको पवित्र करे ॥७॥
भावार्थभाषाः - जो लोग उक्त गुण से विशिष्ट परमात्मा का उपासन करते हैं और उसमें अटल विश्वास रखते हैं, परमात्मा उनको अवश्यमेव पवित्र करता है और जो हतविश्वास होकर ईश्वर के नियम का उल्लङ्घन करते हैं, परमात्मा उनके मद को चूर्ण करने के लिये वज्र के समान उद्यत रहता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

महो दिवो धरुणः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] यह सोम (पृथिव्याः नाभा) = इस शरीर रूप पृथिवी के केन्द्र में होता हुआ, अर्थात् शरीर की सारी शक्तियों का जन्म देनेवाला होता हुआ (महः दिवः धरुणः) = महान् द्युलोक का, मस्तिष्क का (धरुणः) = धारण करनेवाला है । सोम शरीर को सशक्त बनाता है, मस्तिष्क का धारण करता है । (अपां ऊर्मी) = कर्मों की तरंगों में तथा (सिन्धुषु अन्तः) = ज्ञान - समुद्रों में (उक्षितः) = यह सिक्त होता है। अर्थात् निरन्तर कर्मों में लगे रहना तथा ज्ञान-समुद्र में स्नान करना [ स्वाध्याय में तत्पर रहना] सोमरक्षण का साधन बनता है। [२] शरीर में सुरक्षित हुआ हुआ सोम (इन्द्रस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष का (वज्रः) = वज्र होता है। इसी के रक्षण से यह सभी रोगादि शत्रुओं का संहार कर पाता है । (वृषभ:) = यह हमें शक्तिशाली बनानेवाला है । (विभूवसुः) = यह सोम ही इन्द्र का व्यापक धन है । यह (सोमः) = सोम (चारु) = बड़ी सुन्दरता से हृदे हृदय के लिये (मत्सरः) = आनन्द का संचार करता हुआ (पवते) = प्राप्त होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम शरीर का केन्द्र में स्थित हुआ हुआ मस्तिष्क का धारण करनेवाला है । क्रियाशीलता व ज्ञानपरता के द्वारा शरीर में सुरक्षित होता है । यही हमारा शत्रु संहारक वज्र है, शक्ति को देनेवाला तथा व्यापक धन है। हृदय में सोम ही उल्लास को पैदा करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य वज्रः) रुद्ररूपः (वृषभः) कामानां वर्षकः (विभूवसुः) पूर्णैश्वर्ययुक्तः (चारु मत्सरः) सर्वोपरि प्रमोदरूपः पूर्वोक्तः (सोमः) जगदीशः (हृदे) मद्हृदयं (पवते) पवित्रयतु। (पृथिव्या नाभा) यः परमेश्वरः पृथिव्या नाभौ स्थिरः अथ च (महो दिवः) महतो द्युलोकस्य (धरुणः) धारकोऽस्ति। तथा (अपाम् ऊर्मौ) जलतरङ्गेषु (सिन्धुषु) समुद्रेषु च (अन्तः उक्षितः) अभिषिक्तोऽस्ति स परमात्मा मां पवित्रयतु ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Centre-hold of the earth, wielder of the mighty heaven of light, showers of living energy on the waves of the sea, adamantine force of the thunderbolt of Indra, virile and generous, treasure-hold of the wealth of the universe, Soma, ecstatic joy of creative divinity, flows in the holy heart and blesses it with purity.