पदार्थान्वयभाषाः - [१] (कवयः) = क्रान्तप्रज्ञ-तत्त्वद्रष्टा, (अपस:) = कर्मशील, (मनीषिणः) = मन का शासन करनेवाले लोग (अंशुम्) = प्रकाश की रश्मियों को उत्पन्न करनेवाले इस सोम को (दुहन्ति) = अपने में प्रपूरित करते हैं। यह सोम (स्तनयन्तम्) = गर्जना करनेवाला है, प्रभु का स्तवन करनेवाला है, हमें प्रभु-प्रवण बनाता है । (अक्षितम्) = हमें क्षीण नहीं होने देता, सोमरक्षण से हमारी शक्ति ठीक बनी रहती है। (कविम्) = यह हमें क्रान्तप्रज्ञ बनाता है, हमारी बुद्धि को सूक्ष्म करता है, मन में 'स्तनयन्', शरीर में 'आक्षित' तथा मस्तिष्क में 'कवि' बनाता है। [२] सोम का अपने में दोहन [प्रपूरण] करने पर (ई) = निश्चय से (गावः) = ज्ञान की वाणियाँ व (मतयः) = बुद्धियाँ (संयतः) = परस्पर संगत हुईं - हुईं (संयन्ति) = इस सोमरक्षक को प्राप्त होती हैं । परिणामतः, ये सोमरक्षक पुरुष (ऋतस्य योना) = ऋत के उत्पत्ति - स्थान, सदने उस सर्वाधार प्रभु में, सब के आशयभूत प्रभु में, (पुनर्भुवः) = फिर प्रकट होनेवाले होते हैं । अर्थात् ये ब्रह्मलोक में निवासवाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण हमें 'प्रभु की स्तुति करनेवाला, अक्षीण, क्रान्तदर्शी' बनाता है। इसके रक्षण से हमें ज्ञान व बुद्धि प्राप्त होती हैं (धी- विद्या) तथा अन्ततः हम ब्रह्म के साथ विचरते हैं ।