पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोमः) = वीर्यशक्ति उक्षा इव सेक्ता की तरह बनी हुई, शरीर के अंग-प्रत्यंग को सिक्त करती हुई, (यूथा) = प्राणों व इन्द्रियों के गणों के (परियन्) = चारों ओर गति करती हुई, अर्थात् इनका रक्षण करती हुई, (अरावीत्) = उस प्रभु का स्तवन करती है । अर्थात् सोमरक्षण से हमारे शरीरस्थ सभी इन्द्रियादि के गण ठीक बने रहते हैं और हमारा अन्त:करण स्तुति-प्रवण होता है, हमारे मुखों से प्रभु के पवित्र स्तोत्र उच्चरित होते हैं। यह सोमरक्षक पुरुष (सूर्यस्य) ज्ञान - सूर्य की (त्विषी:) = दीप्तियों को (अधि अधित) = आधिक्येन धारण करता है। खूब ज्ञानी बनता है। [२] (दिव्यः) = सदा ज्ञान के प्रकाश में रहनेवाला, (सुपर्ण:) = मन का उत्तमता से पालन करनेवाला (क्षां अवचक्षत) = इस पृथिवीरूप शरीर को सम्यक् देखता है। शरीर का भी पूरा ध्यान करता है । (सोमः) = यह शरीरस्थ सोम [वीर्यशक्ति] (क्रतुना) = ज्ञान व दृष्टिकोणों से ध्यान करती है। में पूर्ण स्वस्थ बनाती है । शक्ति के द्वारा (जा:) = उत्पन्न होनेवाले इनको (परिपश्यते) = सब यह सोमशक्ति इन्हें मस्तिष्क में 'दिव्य', मन में 'सुपर्ण' व शरीर
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण हमें मस्तिष्क में सूर्य के समान ज्ञानदीप्त बनायेगा । हृदय में हम इस सोमरक्षण से पवित्र बनेंगे तथा शरीर में यह सोम ही हमें नीरोग बनायेगा । शरीर में सोम का रक्षण करनेवाले 'हरिमन्तः ' ही अगले सूक्त के ऋषि हैं। ये सोम-स्तवन करते हुए कहते हैं-