पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दश) = दस (स्वसार:) = [ स्व-सृ] आत्मतत्त्व की ओर चलनेवाली इन्द्रियाँ, विषयों में न भटकनेवाली इन्द्रियाँ (रथं न) = जीवनयात्रा के लिये रथ के समान जो यह सोम है, उसे (ई) = निश्चयपूर्वक (भुरिजो:) = बाहुओं में (सं अहेषत) = सम्यक् प्रेरित करती हैं । अर्थात् सोम भुजाओं में शक्ति का स्थापन करनेवाला होता है। और अन्ततः (अदितेः) = अदीना देवमाता की (उपस्थे) = गोद में (आजिगात्) = यह आता है। सुरक्षित सोम हमें अदीन व दिव्य गुण सम्पन्न बनाता है। [२] (यत्) = जब (मतुथा) = मननपूर्वक प्रभु का स्तवन करनेवाले लोग अस्य (अजीजनन्) = इस सोम का अपने अन्दर प्रादुर्भाव करते हैं तो यह सोमरक्षक पुरुष (गो:) = वेदवाणी के (अपीच्यं पदम्) = अन्तर्हित [सुगुप्त] व अतिसुन्दर शब्दों व अर्थों की ओर (उपज्रयति) = समीपता से प्राप्त होता है। अर्थात् इस वेदवाणी को सम्यक् समझनेवाला होता है। वेदवाणी के शब्द 'अपीच्य' [beautiful] सुन्दर हैं, इनका अर्थ [Hidden ] सुगुप्त है । सोम रक्षक पुरुष इन दोनों शब्दार्थों का ग्रहण करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से शक्ति व दिव्यता प्राप्त होती है। बुद्धि सूक्ष्म होकर ज्ञान की वाणियों को समझनेवाली होती है। 'शरीर में शक्ति, मन में दिव्यता, मस्तिष्क में ज्ञान' ।