'द्युक्ष- पर्वतावृध - हर्म्यसक्षणि'
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सहसः) = शक्ति सम्पन्न [सहस्विनः ] (मध्वः) = सोम के कण (परिसिञ्चन्ति) = उस जितेन्द्रिय पुरुष को शरीर में सर्वत्र सिक्त करते हैं जो कि [क] (द्युक्षं) [क्षि निवासे] = ज्ञान - ज्योति में निवास करता है, [ख] पवतावृधम् शरीर को [ पर्वत = A rock] एक चट्टान के समान बढ़ाता है [अश्मा भवतु नस्तनूः ] तथा [ग] (हर्म्यस्य सक्षणिम्) = [ an abode of evil spirits हर्म्य] आसुरभावनाओं के निवास को पराभूत करनेवाला है [ सोढारं सक्षणिम् द०] अर्थात् हृदय को आसुरभावों से शून्य करनेवाला है। वस्तुतः सोमरक्षण से ही यह मस्तिष्क में 'द्युक्ष', शरीर में 'पर्वतावृध' तथा हृदय में 'हर्म्यस्य सक्षणि' बनता है । [२] यह सोमरक्षक वह है (यस्मिन् सुहुतादे) = जिस [सु-हुत-अद्] यज्ञशेष का सेवन करनेवाले में (गावः) = वेदवाणीरूप गौवें (ऊधनि मूर्धन्) = ज्ञानदुग्ध के आधारभूत मस्तिष्क में (वरीमभि:) = हृदय की विशालताओं के साथ (अग्रियम्) = सर्वोत्कृष्ट ज्ञान को (श्रीणन्ति) = परिपक्व करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षक पुरुष ज्ञान में निवास करनेवाला, शरीर को चट्टान के समान दृढ़ बनानेवाला तथा आसुरभावों का पराभव करनेवाला होता है। इसमें ज्ञान की वाणियाँ हृदय की विशालता के साथ उत्कृष्ट ज्ञान को स्थापित करती हैं ।