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अद्रि॑भिः सु॒तः प॑वते॒ गभ॑स्त्योर्वृषा॒यते॒ नभ॑सा॒ वेप॑ते म॒ती । स मो॑दते॒ नस॑ते॒ साध॑ते गि॒रा ने॑नि॒क्ते अ॒प्सु यज॑ते॒ परी॑मणि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

adribhiḥ sutaḥ pavate gabhastyor vṛṣāyate nabhasā vepate matī | sa modate nasate sādhate girā nenikte apsu yajate parīmaṇi ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । पा॒व॒ते॒ । गभ॑स्त्योः । वृ॒षा॒यते॑ । नभ॑सा । वेप॑ते । म॒ती । सः । मो॒द॒ते॒ । नस॑ते । साध॑ते । गि॒रा । ने॒नि॒क्ते । अ॒प्ऽसु । यज॑ते । परी॑मणि ॥ ९.७१.३

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:71» मन्त्र:3 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) स्वयंसिद्ध स्वयम्भू परमात्मा (अद्रिभिः) चित्तवृत्तियों द्वारा साक्षात् किया हुआ (पवते) पवित्र करता है और (गभस्त्योः) इस जीवात्मा की ज्ञानरूपी दीप्तियों को (वृषायते) बलयुक्त तथा (मती) वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा (नभसा वेपते) व्याप्त हो रहा है। (सः) वह (मोदते) आनन्दरूप से विराजमान है और (नसते) सबका अङ्गी-सङ्गी होकर विराजमान है। (गिरा) वेदरूपी वाणियों द्वारा उपासना किया हुआ (साधते) सिद्धि का देनेवाला है और (अप्सु) सत्कर्मों में प्रवेश करके (नेनिक्ते) मनुष्य को शुद्ध करनेवाला है तथा (परीमणि) रक्षाप्रधान यज्ञों में (यजते) सर्वत्र परिपूजित है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो परमात्मा के पात्र होते हैं, वे प्रथम स्वयं उद्योगी बनते हैं फिर परमात्मा उनके उद्योग द्वारा उनको शुद्ध करके परमानन्द का भागी बनाता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मोदते नसते - साधते

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अद्रिभिः) = उपासकों द्वारा [adore] (सुतः) = उत्पन्न हुआ हुआ यह सोम (गभस्त्योः) = भुजाओं में (पवते) = गतिवाला होता है। उपासना के द्वारा ये उपासक, वासनाओं से बचकर सोम को शरीर में ही सुरक्षित कर पाते हैं। यह सुरक्षित सोम भुजाओं में शक्ति का स्थापन करनेवाला होता है । (वृषायते) = यह सोम शक्तिशाली की तरह आचरण करता है। नभसा मस्तिष्करूप द्युलोक के द्वारा तथा मती मननपूर्वक की गयी स्तुति के द्वारा वेपते सर्व शरीर में गतिवाला होता है [सर्वत्र गच्छति सा० ] सोम को शरीर में सुरक्षित करने के प्रमुख साधन 'स्वाध्याय और स्तुति' ही हैं। [२] (सः) = यह सोमरक्षक पुरुष (मोदते) = प्रसन्नता का अनुभव करता है, (नसते) = लक्ष्य - स्थान की ओर बढ़नेवाला होता है [ go toward] साधते कार्यों को सिद्ध करता है। (गिरा नेनिक्ते) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा जीवन का शोधन करता है तथा (परीमणि) = पालन व पूरण के निमित्त (अप्सु यजते) = सदा कर्मों में संगवाला होता है। यह क्रियाशीलता ही इसे शरीर में नीरोग व मन में वासनाशून्य बनाये रखती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम शक्ति देता है, प्रसन्नता प्राप्त कराता है, हमें क्रियाशील बनाता है। ज्ञानाग्नि को दीप्त करके जीवन का शोधन करता है, उत्कृष्ट कर्मों में व्यापृत रखके यह हमारा पालन व पूरण करता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुतः) स्वयंसिद्धः परमेश्वरः (अद्रिभिः) चित्तवृत्तिभिः साक्षात्कृतः सन् (पवते) पवित्रयति। अथ च (गभस्त्योः) अस्य जीवात्मनो ज्ञानरूपदीप्तीः (वृषायते) बलयुताः करोति। तथा (मती) ज्ञानस्वरूपो जगदीश्वरः (नभसा वेपते) व्याप्तो भवति। (सः) असौ परमेश्वरः (मोदते) आनन्दरूपेण विराजते तथा (नसते) सर्वैः सङ्गतो विराजमानोऽस्ति। (गिरा) वेदवाणिभिरुपासितः (साधते) सिद्धिदायकोऽस्ति (अप्सु) सत्कर्मणि प्रविश्य (नेनिक्ते) मनुष्यं पवित्रयति (परीमणि) रक्षायज्ञेषु (यजते) सर्वत्र परिपूजितोऽस्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The soma spirit of life vibrates and sanctifies, distilled and condensed by clouds, realised by sages, shining in sun-rays and reflecting in meditative minds of the yogis. Virile and generous, it waxes in strength, showers with the cloud and inspires all with intelligence. It rejoices, reaches all, makes everything possible, and with the divine voice joins humanity, cleanses and sanctifies, and blesses all in yajna and in their yajnic actions.