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प्र कृ॑ष्टि॒हेव॑ शू॒ष ए॑ति॒ रोरु॑वदसु॒र्यं१॒॑ वर्णं॒ नि रि॑णीते अस्य॒ तम् । जहा॑ति व॒व्रिं पि॒तुरे॑ति निष्कृ॒तमु॑प॒प्रुतं॑ कृणुते नि॒र्णिजं॒ तना॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra kṛṣṭiheva śūṣa eti roruvad asuryaṁ varṇaṁ ni riṇīte asya tam | jahāti vavrim pitur eti niṣkṛtam upaprutaṁ kṛṇute nirṇijaṁ tanā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । कृ॒ष्टि॒हाऽइ॑व । शू॒षः । ए॒ति॒ । रोरु॑वत् । अ॒सु॒र्य॑म् । वर्ण॑म् । नि । रि॒णी॒ते॒ । अ॒स्य॒ । तम् । जहा॑ति । व॒व्रिम् । पि॒तुः । ए॒ति॒ । निः॒ऽकृ॒तम् । उ॒प॒ऽप्रुत॑म् । कृ॒णु॒ते॒ । निः॒ऽनिज॑म् । तना॑ ॥ ९.७१.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:71» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:25» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शूषः) इस संसार की उत्पत्ति करनेवाला परमात्मा (कृष्टिहेव) योद्धा के समान (प्र एति) बड़े प्रभाव से सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है और (असुर्यं) असुरों को (रोरुवत्) अत्यन्त रुलाता है तथा (अस्य) इस जीवात्मा के (तं) पूर्वोक्त (वर्णं) आच्छादन करनेवाली (वव्रिः) वृद्धावस्था को (जहाति) अतिक्रमण करता है और (पितुः एति) पिता के भाव को प्राप्त होकर (निष्कृतं) कृतकार्य और (उपप्रुतं) पूर्ण (कृणुते) बना देता है तथा (तना) इस शरीर को (निर्णिजं) सुन्दररूप युक्त बना देता है और (नि रिणीते) निर्मुक्त करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष परमात्मज्ञान के पात्र हैं, परमात्मा उनको पूर्णज्ञान देकर जरामरणादिभावों से निर्मुक्त करके अमृत बना देता है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तेजस्विता व हृदय की शुद्धता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शूषः) = शत्रुशोषक बलवाला यह सोम (कृष्टिहा इव) = शत्रुहन्ता योद्धा की तरह (प्र एति) = प्रकर्षेण गतिवाला होता है। (रोरुवत्) = खूब ही प्रभु-स्तवन कराता हुआ यह सोम (अस्य) = इस सोमरक्षक पुरुष के (तम्) = उस (असुर्यं वर्णम्) = प्राणशक्ति-सम्पन्न तेजस्वीरूप को (निरिणीते) = निश्चय से प्राप्त कराता है । सोमरक्षण से प्रभु-स्तवन की वृत्ति पैदा होती है और तेजस्विता की प्राप्ति होती है । [२] यह सोम (वव्रिम्) = आच्छादन कर लेनेवाली जरा को (जहाति) = छोड़ता है, बुढ़ापे को नहीं आने देता। (पितुः) = उस परमपिता के (निष्कृतम्) = शुद्ध किये हुए हृदयरूप स्थान को (एति) = प्राप्त होता है । हृदय को शुद्ध बनाता है। (तना) = शक्तियों के विस्तार के द्वारा इस हृदय को (उपप्रुतम्) = [समीपगमनशीलं सा० ] प्रभु के समीप जाने की वृत्तिवाला तथा (निर्णिजम्) = शुद्ध कृणुते करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से तेजस्विता प्राप्त होती है, बुढ़ापा दूर होता है और हृदय बड़ा परिशुद्ध बनता है।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शूषः) अस्य जगत उत्पादकः परमेश्वरः (कृष्टिहेव) योद्धेव (प्र एति) महता प्रभावेन सर्वत्र परिपूर्णोऽस्ति। अथ च (असुर्यम्) राक्षसान् (रोरुवत्) रोदयति। तथा (अस्य) अमुष्य जीवात्मनः (तम्) पूर्वोक्ताम् (वर्णम्) आच्छादानकर्त्रीं (वव्रिम्) वृद्धावस्थाम् (जहाति) अतिक्रामति। अथ च (पितुः एति) पितुर्भावं प्राप्नुवन् (निष्कृतम्) कृतकार्यं तथा (उपप्रुतम्) पूर्णं (कृणुते) करोति। तथा (तना) इदं शरीरं (निर्णिजम्) सुरूपयुक्तं करोति (नि रिणीते) निर्मुक्तं च करोति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The mighty hero of peace, power and plenty, Soma, goes forward roaring like a warrior, loud and bold, revealing, manifesting and displaying that vibrant, assertive and tempestuous character of his which dispels and destroys darkness and evil, realises and maintains the purest sacred spirit of his ancestral tradition in action and attains the perfect, unsullied and absolute fulfilment of his earthly existence.