पदार्थान्वयभाषाः - [१] (शुचिः) = पवित्र (हरिः) = दुःखों का हरण करनेवाला सोम (अरेपसम्) = निर्दोष (तन्वम्) = शरीर को (पुनानः) = पवित्र करता हुआ (अव्ये) = अपना रक्षण करनेवाले पुरुष के (सानवि) = मस्तिष्क रूप शिखर प्रदेश में (न्यधाविष्ट) = निश्चय से गतिवाला होता है। यह 'अव्य' ऊर्ध्वरेता बनता है। इसके शरीर में रेतःकण ऊर्ध्वगतिवाले होकर ज्ञानाग्नि का ईंधन बनते हैं । [२] (मित्राय) = मित्र के लिये (वरुणाय) = वरुण के लिये तथा (वायवे) = वायु के लिये (जुष्टः) = प्रीतिपूर्वक सेवित हुआ हुआ यह सोम (सुकर्मभिः) = उत्तम कर्मोंवाले पुरुषों से 'त्रिधातु मधु' तीनों को धारण करनेवाला मधु (क्रियते) = बनाया जाता है। यह सुरक्षित सोम हमें सबके प्रति स्नेहवाला बनाता है, यह हमें द्वेष से दूर करता है तथा क्रियाशील बनाता है [वा गतौ]। इस प्रकार यह सोम हमारे जीवन में 'मित्र, वरुण व वायु' की स्थापना करता है। ऐसा करने से यह 'त्रिधातु मधु' कहलाता है । इस मधु के रक्षण का उपाय यही है कि हम उत्तम कर्मों में लगे रहें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम शरीर को निर्दोष करता हुआ मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाला होता है। यह हमारे जीवनों में 'स्नेह, निर्देषता व क्रियाशीलता' को स्थापित करता हुआ 'त्रिधातु मधु' कहलाता है।