पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम (रुवति) = प्रभु के स्तोत्रों का उच्चारण करता है । सोमरक्षण से हम प्रभु स्तवन की वृत्तिवाले बनते हैं । (भीमः) = यह शत्रुओं के लिये भयंकर होता है, काम-क्रोध आदि को विनष्ट करता है। (वृषभ:) = शक्तिशाली होता है। (तविष्यया) = बल की कामना से (शृंगे) = अपने शृंगों को (शिशानः) = तीव्र करता है। उन शृंगों को, जो (हरिणी) = हमारे सब कष्टों का हरण करनेवाले हैं। ये श्रृंग ही शरीर के दृष्टिकोण से 'तेजस्विता' तथा मस्तिष्क के दृष्टिकोण से 'ज्ञान' हैं । ये तेजस्विता व ज्ञान हमें सबल बनाते हैं, इनके द्वारा ही रोग व वासना रूप शत्रुओं को पराजित करते हैं। इस प्रकार यह सोम (विचक्षणः) = विशेषरूप से हमारा द्रष्टा होता है, हमारा ध्यान करता है । [२] (सोमः) = यह सोम (सुकृतम्) = अत्यन्त सुसंस्कृत (योनिम्) = शरीर रूप गृह में (आनिषीदति) = सर्वथा स्थित होता है। यह सोम हमारे लिये (गव्ययी) = ज्ञान की वाणियों से बनी हुई (त्वग् भवति) = आवरण होता है । यह 'गव्ययीत्वक्' हमें वासनाओं के आक्रमण से बचाती है। यह सोम (निर्णिक्) = हमारा शोधन व पोषण करनेवाला होता है। (अव्ययी) = [अवि-अय्] यह विविध विषयों की ओर न जानेवाला होता है । सोमरक्षण से इन्द्रियाँ विषयों में जाने से रुकती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें ज्ञान व तेजस्विता रूप शृंगों को प्राप्त कराता है, जिनसे हम वासनाओं व रोगों के आक्रमण से अपने को बचाते हैं ।