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रु॒वति॑ भी॒मो वृ॑ष॒भस्त॑वि॒ष्यया॒ शृङ्गे॒ शिशा॑नो॒ हरि॑णी विचक्ष॒णः । आ योनिं॒ सोम॒: सुकृ॑तं॒ नि षी॑दति ग॒व्ययी॒ त्वग्भ॑वति नि॒र्णिग॒व्ययी॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ruvati bhīmo vṛṣabhas taviṣyayā śṛṅge śiśāno hariṇī vicakṣaṇaḥ | ā yoniṁ somaḥ sukṛtaṁ ni ṣīdati gavyayī tvag bhavati nirṇig avyayī ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रु॒वति॑ । भी॒मः । वृ॒ष॒भः । त॒वि॒ष्यया॑ । शृङ्गे॒ इति॑ । शिशा॑नः । हरि॑णी॒ इति॑ । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । आ । योनि॑म् । सोमः॑ । सुऽकृ॑तम् । नि । सी॒द॒ति॒ । ग॒व्ययी॑ । त्वक् । भ॒व॒ति॒ । निः॒ऽनिक् । अ॒व्ययी॑ ॥ ९.७०.७

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:70» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:7


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - जिस कर्मयोगी की (गव्ययी) सत् असत् का निर्णय करनेवाली (त्वक्) चैतन्यशक्ति (निर्णिगव्ययी) परिशोधन करनेवाली और रक्षा करनेवाली (भवति) होती है, उस (सुकृतम्) सुकृती कर्मयोगी के हृदय को (योनिम्) स्थान बनाकर (तविष्यया) वृद्धि की इच्छा से (भीमः) दुष्ट को भयदाता (वृषभः) कर्मों का वर्षक (विचक्षणः) सर्वज्ञ (सोमः) परमात्मा (आ नि सीदति) निवास करता है और (हरिणी) अविद्या की हरण करनेवाली (शृङ्गे) दो दीप्तियों को (शिशानः) तीक्ष्ण करता हुआ (रुवति) शब्द-स्पर्शादिकों के आश्रयभूत पञ्चतत्त्वों को उत्पन्न करता है ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा जीवरूपी शक्ति और प्रकृतिरूपी शक्ति दोनों का अधिष्ठाता है, वा यों कहो कि उक्त दोनों दीप्तियों को उत्पन्न करके परमात्मा इस ब्रह्माण्ड की रचना करता है ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

हरिणी श्रृंगे

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम (रुवति) = प्रभु के स्तोत्रों का उच्चारण करता है । सोमरक्षण से हम प्रभु स्तवन की वृत्तिवाले बनते हैं । (भीमः) = यह शत्रुओं के लिये भयंकर होता है, काम-क्रोध आदि को विनष्ट करता है। (वृषभ:) = शक्तिशाली होता है। (तविष्यया) = बल की कामना से (शृंगे) = अपने शृंगों को (शिशानः) = तीव्र करता है। उन शृंगों को, जो (हरिणी) = हमारे सब कष्टों का हरण करनेवाले हैं। ये श्रृंग ही शरीर के दृष्टिकोण से 'तेजस्विता' तथा मस्तिष्क के दृष्टिकोण से 'ज्ञान' हैं । ये तेजस्विता व ज्ञान हमें सबल बनाते हैं, इनके द्वारा ही रोग व वासना रूप शत्रुओं को पराजित करते हैं। इस प्रकार यह सोम (विचक्षणः) = विशेषरूप से हमारा द्रष्टा होता है, हमारा ध्यान करता है । [२] (सोमः) = यह सोम (सुकृतम्) = अत्यन्त सुसंस्कृत (योनिम्) = शरीर रूप गृह में (आनिषीदति) = सर्वथा स्थित होता है। यह सोम हमारे लिये (गव्ययी) = ज्ञान की वाणियों से बनी हुई (त्वग् भवति) = आवरण होता है । यह 'गव्ययीत्वक्' हमें वासनाओं के आक्रमण से बचाती है। यह सोम (निर्णिक्) = हमारा शोधन व पोषण करनेवाला होता है। (अव्ययी) = [अवि-अय्] यह विविध विषयों की ओर न जानेवाला होता है । सोमरक्षण से इन्द्रियाँ विषयों में जाने से रुकती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें ज्ञान व तेजस्विता रूप शृंगों को प्राप्त कराता है, जिनसे हम वासनाओं व रोगों के आक्रमण से अपने को बचाते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - यस्य कर्मयोगिविदुषः (गव्ययी) सदसन्निर्णेत्री (त्वक्) चिच्छक्तिः (निर्णिगव्ययी) परिशोधनकर्त्री तथा रक्षिका (भवति) अस्ति तस्य (सुकृतम्) सुकृतिनः कर्मयोगिनो हृदयं (योनिम्) स्थानं कृत्वा (तविष्यया) वर्धितुमिच्छया (भीमः) दुष्टभयदः (वृषभः) कामानां वर्षकः (विचक्षणः) सर्वज्ञः (सोमः) परमेश्वरः (आ नि सीदति) कर्मयोगिनो हृदये निवसति। अथ च (हरिणी) अविद्यानाशिके (शृङ्गे) द्वे दीप्ती (शिशानः) तीक्ष्णीकुर्वन् (रुवति) शब्दस्पर्शा- द्याश्रयभूतपञ्चतत्त्वान्युत्पादयति ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Mighty, virile and generous all-watching soma spirit of divinity, sharpening its top powers of perfection of good and elimination of evil, settles in the heart centre of the man of holy action, vibrates and resounds, and then the man’s perceptive and discriminative intelligence becomes definitive, protective and creative, inviolable.