पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह सोम (मर्मृजान:) = शुद्ध किया जाता हुआ, अर्थात् वासनाओं से मलिन न होता हुआ (इन्द्रियाय) = सब इन्द्रियों की शक्ति के लिये होता है। यह (धायसे) = धारण के लिये होता है, शरीर, मन व बुद्धि सभी का यह धारण करता है । (उभे रोदसी अन्तः) = दोनों द्यावापृथिवी, मस्तिष्क व शरीर के अन्दर (हितः) = स्थापित हुआ हुआ (आहर्षते) = उन्हें आनन्दित करता है, शरीर को स्वस्थ बनाता है और मस्तिष्क को दीप्त करता है । [२] (वृषा) = यह शक्तिशाली सोम (दुर्मती:) = दुष्ट बुद्धियों को शुष्मेण शत्रुशोषक बल से विवाधते विशिष्ट रूप से बाधित करता है । सोमरक्षण से काम, क्रोध, लोभ आदि के बाधन से दुर्मति विनष्ट होकर हमारे में सुमति का प्रादुर्भाव होता है। यह (शर्यहा इव) = हनन-साधन इषुओं से प्रतिभयों के हनन करनेवाले योद्धा की तरह यह सोम (शुरुधः) = [ शुचा रुन्धन्ति ] शोकग्रस्त करनेवाली आसुरभावनाओं को (आदेदिशानः) = आह्वान करता हुआ सोम दूर भगाता है [ पुनः पुनः आह्वयन् हन्ति सा० ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-रक्षित सोम हमारी इन्द्रियों के बल के लिये होता है व धारण के लिये होता है, यह शरीर व मस्तिष्क को शक्तिशाली बनाता है। दुर्मति को दूर करता है और वासनाओं को दूर भगाता है ।