'केतवः, अमृत्यवोऽदाभ्यासः '
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ते) = वे सोमकण (अस्य) = इस सोमरक्षक पुरुष के (केतवः) = प्रज्ञान का साधन (सन्तु) हों । ये सोमकण ही तो ज्ञानाग्नि का ईंधन बनते हैं। (अमृत्यवः) = ये सोमकण अ-मृत्यु हैं, इस सोमी पुरुष को रोगरूप मृत्युओं से आक्रान्त नहीं होने देते । (अदाभ्यासः) = ये काम-क्रोध आदि वासनाओं से हिंसित नहीं होते । सोमरक्षक पुरुष इन वासनाओं का शिकार नहीं होता। इस प्रकार (उभे जनुषी अनु) = भौतिक व अध्यात्म दोनों जीवनों के ये बड़े अनुकूल होते हैं। नीरोगता से भौतिक जीवन की सौन्दर्य बना रहता है और मन की निर्वासनता के कारण अध्यात्म जीवन सुन्दर होता है। [२] ये सोमकण वे हैं, (येभिः) = जिनके द्वारा भौतिक जीवन के दृष्टिकोण से नृम्णा बलों का (पुनते) = पवित्रीकरण करते हैं, (च) = और अध्यात्म दृष्टिकोण से (देव्या) = दिव्यगुणों को अपने में प्रेरित करते हैं [प्रेरयन्ति सा० ] (आत् इत्) = अब शीघ्र ही (राजानम्) = जीवन को दीप्त करनेवाले इस सोम को (मनना) = मनन के द्वारा (अगृभ्णत) = ग्रहण करते हैं । मनन-चिन्तन व ज्ञान प्राप्ति में लगे रहने से सोम का रक्षण होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमकण मस्तिष्क के दृष्टिकोण से 'केतवः', शरीर के दृष्टिकोण से 'अमृत्यवः ' तथा हृदय के दृष्टिकोण से 'अदाभ्यासः ' हैं। ये शरीर में बल को देते हैं तो मन में दिव्यगुणों का धारण करते हैं । मनन द्वारा इनका रक्षण होता है ।