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स भिक्ष॑माणो अ॒मृत॑स्य॒ चारु॑ण उ॒भे द्यावा॒ काव्ये॑ना॒ वि श॑श्रथे । तेजि॑ष्ठा अ॒पो मं॒हना॒ परि॑ व्यत॒ यदी॑ दे॒वस्य॒ श्रव॑सा॒ सदो॑ वि॒दुः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa bhikṣamāṇo amṛtasya cāruṇa ubhe dyāvā kāvyenā vi śaśrathe | tejiṣṭhā apo maṁhanā pari vyata yadī devasya śravasā sado viduḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । भिक्ष॑माणः । अ॒मृत॑स्य । चारु॑णः । उ॒भे इति॑ । द्यावा॑ । काव्ये॑न । वि । श॒श्र॒थ्चे । तेजि॑ष्ठाः । अ॒पः । मं॒हना॑ । परि॑ । व्य॒त॒ । यदि॑ । दे॒वस्य॑ । श्रव॑सा । सदः॑ । वि॒दुः ॥ ९.७०.२

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:70» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:23» मन्त्र:2 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:2


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भिक्षमाणः) प्रकृतिरूपी लाभ करता हुआ (चारुणोऽमृतस्य) सुन्दर अमृत देनेवाले (उभे द्यावा) द्युलोक और पृथिवीलोक को (काव्येन) अपनी चतुराई से (विशश्रथे) व्यक्त करता है। (सः) वह परमात्मा (तेजिष्ठा अपः) तेजस्वी जलमय परमाणुओं के (मंहना) महत्त्व से (परिव्यत) आच्छादन करता है। (यदि देवस्य) अगर दिव्यज्ञान के (श्रवसा) महत्त्व से (सदः) सद्रूपब्रह्म को (विदुः) जाने, तो उक्त परमात्मा के कर्तव्य को जान सकते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष परमात्मा के महत्त्व को जानते हैं, वे ही इस जगत् की अद्भुत सत्ता जान सकते हैं, अन्य नहीं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवस्य सदः विदुः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स) = वह सोमरक्षक पुरुष (अमृतस्य) = नीरोगता के आधारभूत (चारुणः) = जीवन को सुन्दर बनानेवाले इस सोम का (भिक्षमाणः) = याचन करता हुआ, सोमरक्षण के लिये ही प्रभु से आराधना करता हुआ, (उभे द्यावा) = दोनों मस्तिष्क व शरीर रूप द्यावापृथिवी को (काव्येन) = उत्कृष्ट ज्ञान से (विशश्रथे) = [delight repeatedly] निरन्तर आनन्दित करता है। [२] इस सोमरक्षण के द्वारा (तेजिष्ठा:) = अत्यन्त तेजस्विता को धारण करानेवाले (अपः) = रेतः कणों को परिवत चारों ओर से ओढ़नेवाला बनता है। रेतः कणों को अपना कवच बनाता है। (मंहना) = [ मंह = To grow, increase, To shine] विकास के दृष्टिकोण से अथवा चमकने के दृष्टिकोण से वह ऐसा करता है। सारी उन्नति व दीप्ति का निर्भर इस सोम पर ही तो है। इस सोम को अपना कवच बनाने पर (यद्) = जब (ई) = निश्चय से ये सोमरक्षक पुरुष (श्रवसा) = ज्ञान प्राप्ति के द्वारा (देवस्य सदः) = उस देव के अधिष्ठान, अर्थात् ब्रह्मलोक को (विदुः) = जान लेते हैं। सोमरक्षण से अपने ज्ञान को बढ़ाते हुए अन्ततः हम ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम [वीर्य] अमृत है, चारु [सुन्दर] है। ये शरीर व मस्तिष्क को दीप्ति से युक्त करता है। इसके द्वारा हम ज्ञान वृद्धि को करते हुए अन्ततः ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं ।
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (भिक्षमाणः) प्रकृतितत्त्वस्य लाभं कुर्वन्तं (चारुणोऽमृतस्य) प्रियामृतप्रदातारं (उभे द्यावा) द्युलोकं पृथिवीलोकं च (काव्येन) स्वचातुर्येण (विशश्रथे) व्यक्तं करोति (सः) असौ परमात्मा (तेजिष्ठा अपः) तेजस्विजलपरमाणूनां (मंहना) महत्त्वेन (परिव्यत) आच्छादयति। (यदि देवस्य) यदि दिव्यज्ञानस्य (श्रवसा) महत्त्वेन (सदः) सद्रूपब्रह्म (विदुः) विदाङ्कुर्वन्तु चेत्तदोक्तपरब्रह्मणः कर्तृत्वं ज्ञास्यन्ति ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He, loving, sharing and pervading the immortal beauty of existence, orders and adorns both heaven and earth with his art, intelligence and poetic sublimity, also vesting the vapours of the middle regions with his might and splendour. Those who know the reality of the lord’s creation alongwith his power, love and generosity really know and share the bliss.