पदार्थान्वयभाषाः - [१] (स) = वह सोमरक्षक पुरुष (अमृतस्य) = नीरोगता के आधारभूत (चारुणः) = जीवन को सुन्दर बनानेवाले इस सोम का (भिक्षमाणः) = याचन करता हुआ, सोमरक्षण के लिये ही प्रभु से आराधना करता हुआ, (उभे द्यावा) = दोनों मस्तिष्क व शरीर रूप द्यावापृथिवी को (काव्येन) = उत्कृष्ट ज्ञान से (विशश्रथे) = [delight repeatedly] निरन्तर आनन्दित करता है। [२] इस सोमरक्षण के द्वारा (तेजिष्ठा:) = अत्यन्त तेजस्विता को धारण करानेवाले (अपः) = रेतः कणों को परिवत चारों ओर से ओढ़नेवाला बनता है। रेतः कणों को अपना कवच बनाता है। (मंहना) = [ मंह = To grow, increase, To shine] विकास के दृष्टिकोण से अथवा चमकने के दृष्टिकोण से वह ऐसा करता है। सारी उन्नति व दीप्ति का निर्भर इस सोम पर ही तो है। इस सोम को अपना कवच बनाने पर (यद्) = जब (ई) = निश्चय से ये सोमरक्षक पुरुष (श्रवसा) = ज्ञान प्राप्ति के द्वारा (देवस्य सदः) = उस देव के अधिष्ठान, अर्थात् ब्रह्मलोक को (विदुः) = जान लेते हैं। सोमरक्षण से अपने ज्ञान को बढ़ाते हुए अन्ततः हम ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम [वीर्य] अमृत है, चारु [सुन्दर] है। ये शरीर व मस्तिष्क को दीप्ति से युक्त करता है। इसके द्वारा हम ज्ञान वृद्धि को करते हुए अन्ततः ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं ।