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हि॒तो न सप्ति॑र॒भि वाज॑म॒र्षेन्द्र॑स्येन्दो ज॒ठर॒मा प॑वस्व । ना॒वा न सिन्धु॒मति॑ पर्षि वि॒द्वाञ्छूरो॒ न युध्य॒न्नव॑ नो नि॒दः स्प॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hito na saptir abhi vājam arṣendrasyendo jaṭharam ā pavasva | nāvā na sindhum ati parṣi vidvāñ chūro na yudhyann ava no nidaḥ spaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हि॒तः । न । सप्तिः॑ । अ॒भि । वाज॑म् । अ॒र्ष॒ । न्द्र॑स्य । इ॒न्दो॒ इति॑ । ज॒ठर॑म् । आ । प॒व॒स्व॒ । ना॒वा । न । सिन्धु॑म् । अति॑ । प॒र्षि॒ । वि॒द्वान् । शूरः॑ । न । युध्य॑न् । अव॑ । नः॒ । नि॒दः । स्प॒रिति॑ स्पः॑ ॥ ९.७०.१०

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:70» मन्त्र:10 | अष्टक:7» अध्याय:2» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:9» अनुवाक:4» मन्त्र:10


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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) परमैश्वर्यसम्पन्न परमात्मन् ! (नावा न) जैसे नाविक जन (सिन्धुम्) नदी को (अति पर्षि) पार करते हैं, ऐसे आप हमको संसारसागर से पार करें। (विद्वान् शूरो न) और जैसे विद्वान् शूरवीर (युध्यन्) युद्ध करता हुआ (नः) हम लोगों के (निदः) निन्दकों को (अवस्पः) मारता है, इसी तरह आप दुष्टों को दमन कर श्रेष्ठों को उबारें और (सप्तिः न) जैसे सूर्य (वाजं) ऐश्वर्य को उत्पन्न करता हुआ (अभ्यर्ष) अपने लक्ष्य को प्राप्त होता है, इसी प्रकार आप (इन्द्रस्य) कर्मयोगी के (जठरं) हृदय में ज्ञानरूपी सत्ता से विराजमान होकर (आ पवस्व) पवित्र करें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सूर्य के समान अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करके हमारे हृदय में ज्ञानदीप्ति का प्रकाश करता है ॥१०॥ यह ७० वाँ सूक्त और २४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शूरो न युध्यन्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्दो) = सोम (हितः सप्तिः न) = प्रेरित किये हुए घोड़े के समान [ हितः प्रहित:] तू (वाजं अभि अर्ष) = संग्राम की ओर चलनेवाला हो। तू (इन्द्रस्य) = जितेन्द्रिय पुरुष के (जठरं आपवस्व) = उदर में प्राप्त हो । जितेन्द्रिय पुरुष के शरीर में रहता हुआ तू रोगकृमियों व वासनाओं के साथ संग्राम को करनेवाला हो । इन्हें तूने ही तो समाप्त करना है। [२] (विद्वान्) = हमें ज्ञानी बनाता हुआ तू सब वासनाओं से (अतिपर्षि) = उसी प्रकार पार ले चल (न) = जैसे कि (नावा सिन्धुम्) = नौका से समुद्र को पार करते हैं। (शूरः न) = एक शूर के समान (युध्यन्) = युद्ध करता हुआ (नः) = हमें (निदः) = सब निन्दनीय बातों से (अपस्पः) = [पारय] पार कर । हम सब पापों को युद्ध में पराजित करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में सुरक्षित सोम एक योद्धा की तरह हमारे रोग व वासनारूप शत्रुओं को विनष्ट करता है | सोमरक्षण से शक्तिशाली बना हुआ यह 'ऋषभ' कहलाता है। यह सब के प्रति स्नेहवाला होने से 'वैश्वामित्र' है। यह कहता है-
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दो) परमैश्वर्यसम्पन्न परमात्मन् ! (नावा न) यथा नाविका नराः (सिन्धुम्) नदीं (अति पर्षि) पारयन्ति तथा भवान् अस्मान् संसारसागरतः पारं करोतु। (विद्वान् शूरो न) यथा प्राज्ञः शूरः (युध्यन्) युद्धं कुर्वन् (नः) अस्माकं (निदः) निन्दकान् (अवस्पः) हिनस्ति, तथा भवानपि दुष्टान्निहत्य श्रेष्ठान् जनान् परिपालयतु। अथ च (सप्तिः न) यथा सूर्यः (वाजम्) ऐश्वर्यमुत्पादयन् (अभ्यर्ष) स्वलक्ष्यं प्राप्नोति तथा त्वं (इन्द्राय) कर्मयोगिनः (जठरम्) हृदये ज्ञानरूपसत्तया विराजमानः (आ पवस्व) पवित्रयस्व ॥१०॥ इति सप्ततितमं सूक्तं चतुर्विंशो वर्गश्च समाप्तः ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like a war horse directed to the field of battle, come Indu, Soma spirit of peace, power and joyous action, flow, enter and purify the spirit of Indra, man of action and the social order. Like the mariner crossing the sea by boat, advance, O scholar and warrior, fighting on. Protect us, destroy the scandal mongers and take us across the sea of life.