ऋत के द्वारा सोम का रक्षण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्दवः) = सोमकण (ऋतस्य पथा) = ऋत के मार्ग से [ऋत-यज्ञ] यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहने से अथवा [ऋत, right] दिनचर्या को नियमित रूप से पालने के द्वारा (धर्मन्) = धारणात्मक कर्म में (असृग्रम्) = [सृज्यन्ते] लगाये जाते हैं । अर्थात् ऋत के द्वारा सोम का रक्षण होता है। ऋत का भाव है- [क] यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहना, [ख] दिनचर्या का ठीक पालना। ऐसा करने से वासनाओं का आक्रमण नहीं होता, और सोम के रक्षण का सम्भव होता है, रक्षित सोम हमारा धारण करनेवाले होते हैं । [२] ये सोम (सुश्रियः) = उत्तम श्री का [शोभा का] कारण बनते हैं तथा (अस्य) = इस जीव के (योजनम्) = प्रभु के साथ मेल को (विदाना:) = जाननेवाले व प्राप्त करानेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ऋत के द्वारा सोम का रक्षण होता है। रक्षित सोम - [क] शरीर का धारण करता है, [ख] हमें श्री सम्पन्न बनाता है, [ग] प्रभु के साथ हमारा मेल कराता है।