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असृ॑ग्र॒मिन्द॑वः प॒था धर्म॑न्नृ॒तस्य॑ सु॒श्रिय॑: । वि॒दा॒ना अ॑स्य॒ योज॑नम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

asṛgram indavaḥ pathā dharmann ṛtasya suśriyaḥ | vidānā asya yojanam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

असृ॑ग्रम् । इन्द॑वः । प॒था । धर्म॑न् । ऋ॒तस्य॑ । सु॒ऽश्रिय॑ह् । वि॒दा॒नाः । अ॒स्य॒ । योज॑नम् ॥ ९.७.१

ऋग्वेद » मण्डल:9» सूक्त:7» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:28» मन्त्र:1 | मण्डल:9» अनुवाक:1» मन्त्र:1


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आर्यमुनि

अब परमात्मा को अनेक धर्मों का आधार कथन करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दवः) विज्ञानी पुरुष (अस्य) इस परमात्मा के (योजनम्) सम्बन्ध को (विदाना) जानते हुए (सुश्रियः) अनन्त प्रकार की शोभाओं को धारण करते हैं (ऋतस्य) और इस सत्यरूप परमात्मा के (धर्मन्) धर्म में रहते हुए (असृग्रम्) अच्छे गुणों का लाभ करते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष परमात्मा और प्रकृति के सम्बन्ध को जानते हैं और परमात्मा के यथार्थ ज्ञान को जानकर उसके धर्मपथ पर चलते हैं, वे संसार में ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऋत के द्वारा सोम का रक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इन्दवः) = सोमकण (ऋतस्य पथा) = ऋत के मार्ग से [ऋत-यज्ञ] यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहने से अथवा [ऋत, right] दिनचर्या को नियमित रूप से पालने के द्वारा (धर्मन्) = धारणात्मक कर्म में (असृग्रम्) = [सृज्यन्ते] लगाये जाते हैं । अर्थात् ऋत के द्वारा सोम का रक्षण होता है। ऋत का भाव है- [क] यज्ञात्मक कर्मों में लगे रहना, [ख] दिनचर्या का ठीक पालना। ऐसा करने से वासनाओं का आक्रमण नहीं होता, और सोम के रक्षण का सम्भव होता है, रक्षित सोम हमारा धारण करनेवाले होते हैं । [२] ये सोम (सुश्रियः) = उत्तम श्री का [शोभा का] कारण बनते हैं तथा (अस्य) = इस जीव के (योजनम्) = प्रभु के साथ मेल को (विदाना:) = जाननेवाले व प्राप्त करानेवाले होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ऋत के द्वारा सोम का रक्षण होता है। रक्षित सोम - [क] शरीर का धारण करता है, [ख] हमें श्री सम्पन्न बनाता है, [ग] प्रभु के साथ हमारा मेल कराता है।
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आर्यमुनि

अथ परमात्मनो विविधगुणाकरत्वं वर्ण्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्दवः) विज्ञानिनः (अस्य) अस्य परमात्मनो हि (योजनम्) सम्बन्धम् (विदाना) जानन्तः (सुश्रियः) विविधशोभा दधति (ऋतस्य) तथा च सत्यस्यास्य परमात्मनः (धर्मन्) धर्मणि तिष्ठन्तः (असृग्रम्) सुगुणान् लभन्ते ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Knowing the relevance of their vibrant action in Dharma, wise sages, brilliant and gracious, move by the path of rectitude following the eternal law of existence created by the lord of peace and glory.